23. लक्ष्मी नारायण मंडल
कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता एवं जीवनपर्यंत सामंत वादियों से संघर्ष करने वाले, भगवती मंदिर कॉलेज बरारी के पूर्व प्राचार्य, 1978 से लगातार 22 वर्षों तक कुर्सेला प्रखंड के पूर्वी मुरादपुर (बसुहार) के मुखिया रहे लक्ष्मी नारायण मंडल एक प्रबुद्ध शिक्षाविद एवं कमजोर, लाचार लोगों के लिए संघर्ष करने वाले योद्धा के रूप में बरारी विधानसभा में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। इनका जन्म कटाव पीड़ित गरीब कृषक परिवार में 22 जुलाई 1948 को कुर्सेला के मजदिया गांव में हुआ था। इनकी माता का नाम स्वर्गीय यमुना देवी एवं पिता का नाम स्वर्गीय सौदागर प्रसाद मंडल है। यह अपने माता-पिता के आठ संतानों में दूसरे नंबर पर आते हैं। इनकी प्रारंभिक शिक्षा अपर प्राइमरी स्कूल बसुहार में हुई। 1967 में अयोध्या प्रसाद उच्चतर माध्यमिक विद्यालय से इन्होंने साइंस विषय से फ्री यूनिवर्सिटी की परीक्षा पास किया। 1969 में इन्होंने जयप्रकाश नारायण महाविद्यालय नारायणपुर में प्रवेश लिया लेकिन आर्थिक समस्याओं के कारण इन्हें तीन चार माह बाद ही वहां से वापस आना पड़ा।इसके पश्चात गजाधर भगत महाविद्यालय नवगछिया में इन्होंने नामांकन लेकर प्रीवियस यूनिवर्सिटी की परीक्षा साइंस विषय से पास किया। 1972-74 में इनके द्वारा डीएस कॉलेज कटिहार से स्नातक की पढ़ाई हिंदी विषय से पूरी की गई। 1974-76 मैं इनके द्वारा भागलपुर विश्वविद्यालय से हिंदी विषय से स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त किया गया। आगे चलकर 1986-88 मैं इनके द्वारा मिथिला विश्वविद्यालय से हिंदी विषय से ही डबल एम. ए. की डिग्री भी प्राप्त किया गया। दरअसल कक्षा नौवीं के पश्चात ही इनके माता-पिता ने अपनी दयनीय आर्थिक स्थिति के कारण इनके पढ़ाई का खर्च उठाने से इनकार कर दिया था लेकिन शिक्षा प्राप्त करने और लगातार कठिन परिस्थितियों में संघर्ष करने की जिजीविषा ने इन्हें कभी भी हिम्मत नहीं हारने दिया। नौवीं कक्षा से ही बच्चों को ट्यूशन पढ़ा कर इनके द्वारा डबल एम ए तक की पढ़ाई पूरी किया गया। 28 जून 1974 को इनका विवाह कटिहार के एक मध्यमवर्गीय परिवार में श्रीमती शांति देवी से हुई। इसी वर्ष इन्हें स्नातकोत्तर में एडमिशन लेना था लेकिन इनके पास पर्याप्त फीस नहीं था। ऐसे में इनकी नव विवाहिता धर्मपत्नी ने विवाह के अवसर पर उपहार में प्राप्त सोने की अंगूठी बेचकर इन्हें अपना पढ़ाई जारी रखने के लिए प्रोत्साहित किया। अपने छात्र जीवन में इन्हेंडीएस कॉलेज के तीन प्रोफेसरों का विशेष सहयोग और मार्गदर्शन प्राप्त हुआ। डीएस कॉलेज के हिंदी विभागाध्यक्ष (जो बाद में कॉलेज के प्रिंसिपल भी बने) इंद्रदेव गुप्ता इनके आर्थिक मजबूरी को समझते थे और इन्हें जो जरूरत की किताब उपलब्ध करवाने में मदद करते थे। डी एस कॉलेज के ही हिंदी के प्रोफेसर (जिन्होंने बाद में कटिहार से सांसद का चुनाव भी लड़ा) भरत शर्मा ने इन्हें कम्युनिस्ट विचारधारा से अवगत कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाया। भरत शर्मा कम्युनिस्ट विचारधारा से काफी प्रभावित थे और मजदूर यूनियन के लिए जीवन पर्यंत संघर्ष करते रहे। डी एस कॉलेज के हिंदी के एक और प्रोफेसर डॉक्टर तारा मोहन प्रसाद ने भी इन्हें आगे बढ़ने के लिए लगातार प्रेरित किया और एक अभिभावक के रूप में इनका लगातार मार्गदर्शन किया। गणित और अंग्रेजी के विद्वान शिक्षक जनार्दन मंडल एवं लाहौर से भारत के विभाजन के पश्चात भारत लौटे हिंदी के विद्वान शिक्षक जय देव ठाकुर ने स्कूली शिक्षा के दिनों में इन्हें पढ़ाई के प्रति काफी प्रोत्साहित करते रहते थे।
श्री मंडल एक अच्छे छात्र के साथ एक अच्छे खिलाड़ी भी थे। 1967 68 में अयोध्या प्रसाद उच्च विद्यालय में एक खेल प्रतियोगिता का आयोजन किया गया जिसमें तत्कालीन मुख्यमंत्री केबी सहाय के द्वारा इन्हें प्रथम पुरस्कार से पुरस्कृत किया गया था। छात्र जीवन से ही श्री मंडल को आर्थिक परेशानियों के अलावा सामंतवादी ताकतों से संघर्ष करने की कीमत भी चुकानी पढ़ती थी। दरअसल अपने समाज में गरीबों दलितों एवं पिछड़ों के ऊपर सामंतवादी ताकतों द्वारा किए जा रहे अत्याचार इन्हें बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं होते थे। 1962 में कम्युनिस्ट पार्टी के कटिहार जिला के सचिव बजरंग श्राप के द्वारा इन्हें पार्टी के मजदिया शाखा का सदस्य बनाया गया। 1970-72 में अपने साथियों बजरंग श्राप, चानो ठाकुर, पंडित, रूपण ठाकुर, नागेंद्र नंदन साह, पूर्व सरपंच नारायण यादव आदि के साथ गुप्त मीटिंग कर इन्होंने सामंतवादियों के खिलाफ आम लोगों को जागरूक करने के उद्देश्य पर्ची छपवा कर रातों-रात पूरे इलाके में बटवा दिया। यह बात जब उजागर हुई तो इन्हीं सामंत वादियो ने इनके कुछ साथियों की हत्या करवा दी। इन्हें भी विद्यालय से निकालने का षडयंत्र रचा गया। इन्हें कई बार जेल भी जाना पड़ा और कई बार तो परीक्षा में शामिल होने के लिए निर्गत होने वाले प्रवेश पत्र के आधार पर इन्हें जमानत मिल पाता था। विभिन्न प्रकार के झूठे मुकदमे में फंसा कर इनके छोटे भाई बिमल कुमार (भगवती मंदिर कॉलेज के लाइब्रेरियन एवं क्लर्क) को छोड़कर परिवार के सभी पुरुष सदस्यों को जेल में डाल दिया गया। इनके क्रांतिकारी प्रवृत्ति की कीमत इनके पिताजी और चाचा जी के अलावा इनके भाइयों इंदिरा नंद मंडल (कटिहार सिविल कोर्ट के सीनियर अधिवक्ता), अरविंद कुमार (शिक्षक एवं राष्ट्रीय स्तर के फाइन आर्टिस्ट), अनिल कुमार (कृषक), और दिलीप कुमार (भगवती मंदिर कॉलेज में विज्ञान के प्रोफेसर) को जेल जाकर चुकाना पड़ा।1975-76 में तीन बार घर में लगातार कुर्की जब्ती होने के बावजूद इनके परिवारजनों और विशेष रूप से इन्हें अपनी माता का समर्थन और सहयोग प्राप्त होता रहा जिसके कारण उन्होंने कभी भी संघर्ष पथ पर अपना हिम्मत नहीं हारा। जेपी आंदोलन के पूर्व आयुर्वेदिक महाविद्यालय पटना के छात्रों की समस्याओं के समाधान हेतु पटना में एक व्यापक आंदोलन हुआ। इस आंदोलन में भाग लेने के लिए अपने मित्र नागेंद्र नंदन शाह के साथ पटना गए हुए थे, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री एवं केंद्रीय मंत्री लालू यादव भी पटना विश्वविद्यालय के छात्र संघ के सचिव के रूप में आंदोलन का समर्थन कर रहे थे। सरकार के द्वारा आंदोलन को दबाने के लिए निर्दयता पूर्व पुलिस से लाठी चार्ज करवाया गया जिसमें दो दर्जन से ज्यादा छात्र गंभीर रूप से घायल हो गए। दुर्भाग्य से नागेंद्र नंदन साह भी बुरी तरह घायल हो गए। इसी घायल अवस्था में स्टूडेंट फेडरेशन के ऑल इंडिया कांफ्रेंस में भाग लेने के लिए दोनों कन्याकुमारी के निकट केरल स्थित त्रिवेंद्रम पहुंच गए। इस कांफ्रेंस में देश की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में छात्रों एवं जनता की विभिन्न समस्याओं के समाधान हेतु एक व्यापक आंदोलन का निर्णय लिया गया। 1970 में श्री मंडल को प्रदेश सचिव मुख़्तार हुसैन के द्वारा स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया का राज्य स्तरीय कमेटी का सदस्य मनोनीत किया गया।
1972 में इन्हें क्रांतिकारी नक्षत्र मालाकार से मिलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ जब उनके स्वागत के लिए कुर्सेला से 600 से ज्यादा लोगों के साथ यह नक्षत्र मालाकार के घर आए थे और उन्हें हाथी पर बिठाकर पूरे इलाके में घुमाया गया था। अपने क्रांतिकारी गतिविधियों और सामाजिक सहयोग के कारण श्री मंडल लोगों के बीच धीरे धीरे काफी लोकप्रिय हो गए थे। यही कारण है कि 1978 में जब इन्हें आम जनता के दबाव में मुखिया का चुनाव लड़ना पड़ा तो यह अपने पहले ही प्रयास प्रयास में ऊंट छाप से पूर्व मुखिया कृष्ण मोहन मंडल को हराने में सफल रहे और और लगातार 22 वर्षों तक पूर्वी मुरादपुर (बसुहार) के मुखिया रहने का इन्हें सौभाग्य प्राप्त हुआ। अपने पंचायत के कार्यों हेतु इन्हें अक्सर प्रखंड कार्यालय बरारी आना पड़ता था क्योंकि उस समय कुर्सेला बरारी प्रखंड का ही एक हिस्सा था। इसी दौरान इनकी मित्रता बरारी के पूर्व मुखिया संतराम सिंह से हो गई और नक्षत्र मालाकार के मार्गदर्शन में 51 लोगों के कमेटी का गठन कर भगवती मंदिर कॉलेज बरारी के स्थापना का निर्णय लिया गया। दरअसल नक्षत्र माला कार अपने क्षेत्र के पिछड़ेपन का मूल कारण अशिक्षा को मानते थे और उच्च शिक्षा के व्यापक प्रसार के उद्देश्य से भगवती मंदिर कॉलेज की स्थापना की गई थी जिसमें श्री मंडल को 53 रुपया 75 पैसा के शुरुवाती वेतन पर हिंदी के विभागाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था। बाद में इन्हें कॉलेज का प्रिंसिपल बनने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। कॉलेज का प्रिंसिपल रहते हुए इन्होंने आम लोगों के सहयोग से हॉस्टल और चहारदीवारी का निर्माण करवाया। 1981 में कॉलेज को इंटर और 1990 में डिग्री कॉलेज की मान्यता दिलवाने में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। शिक्षा में सुधार के साथ छात्रों के रिजल्ट में सुधार के लिए भी इन्होंने उल्लेखनीय प्रयास किया। गरीब बच्चों के कई छात्रों का फीस इन्होंने अपने पॉकेट से भरकर उन्हें अपनी पढ़ाई पूरी करने में सहयोग किया।
1988 में इन्हें कम्युनिस्ट पार्टी के द्वारा बरारी विधानसभा का उम्मीवार भी बनाया गया और इन्होंने काफ़ी उत्साह के साथ अपना नामांकन दाखिल करवाया लेकिन बड़े भाई राजेन्द्र मंडल और इंद्रा नंद मंडल के आग्रह पर इन्होंने अपना नामांकन वापस ले लिया। इससे बिहार प्रदेश के महामंत्री सुरजीत बाबू और वरिष्ठ कम्युनिस्ट नेता गणेश शंकर विद्यार्थी सहित कई कद्दावर नेता इनसे नाराज़ हो गये।अपने सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में श्री मंडल को जनार्दन भगत, जनसंघ के वरिष्ठ नेता जय कृष्ण यादव, बिहार सरकार के पूर्व मंत्री कारुनेश्वर सिंह और मंसूर आलम का भरपुर सहयोग प्राप्त हुआ। श्री मंडल आज भी बरारी के छात्रों के बीच हिंदी, समाज शास्त्र और गृह विज्ञान के अच्छे प्रोफ़ेसर के रूप काफी लोकप्रिय हैं। इनके परिवार में तीन पुत्र कुंदन कुमार (शिक्षक), अभिनंदन कुमार (शिक्षक) और अमन कुमार (भाजपा के पिछड़ा वर्ग के जिला मंत्री) एवं एक पुत्री सुनिधि कुमारी एवं दामाद अमित मोर्या (शिक्षक) हैं।
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