34. चंद्र्किशोर तिवारी उर्फ चुनचुन सर
हंस एंड भवानी कोचिंग सेंटर, मधुबनी (सेमापुर) के संस्थापक निदेशक चंद्रकिशोर तिवारी उर्फ चुनचुन सर पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण नवोदय विद्यालय में अपनी पढ़ाई बीच में छोड़ने के बाद गरीब बच्चों को पढ़ाना अपना जीवन का उद्देश्य बना लिया। मधुबनी, गुंजरा, डहरा, भवानीपुर, काबर, लक्ष्मीपुर, पिपरिया टोला, सुखासन, इस्लामपुर, डुमरिया, परजेली, दुर्गापुर, आदिवासी टोला, सेमापुर बाज़ार, टिकटिकी पाड़ा, मखनाहाधार आदि के लगभग दो हजार से ज्यादा छात्र- छात्राओं को मैट्रिक परीक्षा पास करवा चुके श्री तिवारी के स्वयं का जीवन अत्यंत संघर्षपूर्ण रहा है। इनका जन्म 7 मार्च 1980 को पटना सिटी में एक अत्यंत गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। यह अपने दो भाईयों में छोटे थे। इनकी माता का नाम श्रीमती उर्मिला देवी और पिता का नाम चंद्रेश्वरी तिवारी है। इनके पिताजी मूलतः खड़गपुर गांव, महनार (वैशाली) के रहने वाले हैं लेकिन रोजी रोटी की तलाश में यह राजधानी में आकर एक छोटा सा होटल चलाते थे। श्री तिवारी का ननिहाल बावानगंज (सेमापुर) में है। 1984 में इनके मामाजी शत्रुघन तिवारी ने इनके पिताजी से आग्रह कर इनके पूरे परिवार को हमेशा के लिए सेमापुर ले आए। उस समय श्री तिवारी चार वर्ष का अबोध बालक थे। इनके पिताजी सेमापुर बाज़ार में होटल चला कर अपने परिवार का पालन पोषण करने लगे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा मध्य विद्यालय सेमापुर में हुई। श्री तिवारी बचपन से एक मेधावी छात्र थे और कक्षा चार और कक्षा छह में छात्रवृति के लिए हुई परीक्षा में बरारी प्रखंड में अव्वल आए थे। मध्य विद्यालय सेमापुर के शिक्षक विष्णु बाबू का इन्हें विशेष स्नेह और मार्गदर्शन प्राप्त होता रहता था। पढ़ाई के दौरान इन्हें काफी आर्थिक समस्याओं का सामना करना पड़ता था। इसके बावजूद 1990 में श्री तिवारी नवोदय विद्यालय की प्रवेश परीक्षा में सफलता प्राप्त किया। 1995 में इन्होंने नवोदय विद्यालय कोलासी से मैट्रिक की परीक्षा पास किया। इसी दौरान एक रात अचानक इन्होंने स्वप्न में अपने बड़े भाई को मृत पाया और दुर्भाग्य से एक सप्ताह बाद ही इनके बड़े भाई मुकेश तिवारी की बाइस वर्ष की आयु में आकस्मिक निधन हो गया। यह इनके परिवार के लिए एक बहुत बड़ी त्रासदी थी। एक गरीब परिवार का युवा कमाऊ पुत्र के अचानक काल के गाल में जाने से इनकी मां काफी विक्षिप्त हो गई। ऐसे में अपनी मां को संभालने के लिए इन्हें नवोदय विद्यालय छोड़ना पड़ा। एक वर्ष पश्चात जब इनकी मां इस सदमे से थोड़ा बाहर अाई तो उन्होंने श्री तिवारी को पुनः पढ़ाई शुरू करने के लिए प्रेरित करना प्रारंभ कर दिया। मां के जिद्द पर श्री तिवारी ने सुर तुलसी कालेज कटिहार में आर्ट्स विषय में इंटर में नामांकन करवा लिया। अपनी पढ़ाई और घर की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए इन्होंने होम ट्यूशन करना प्रारंभ कर दिया। इनके पास साईकिल खरीदने के लिए भी पर्याप्त पैसे नहीं थे। इसलिए इन्हें ट्यूशन पढ़ाने के लिए सात से दस किलोमीटर की दूरी पैदल चलना पड़ता था। 1998 में इन्होंने मैट्रिक की परीक्षा पास किया। इसके पश्चात ईश्वर में प्रबल आस्था होने और अपनी आध्यात्मिक प्रवृति के कारण इन्होंने के बी झा महाविद्यालय कटिहार में दर्शनशास्र में स्नातक की पढ़ाई के लिए नामांकन लिया और 2003 में दर्शनशास्र से स्नातक की डिग्री हासिल किया। अपने छात्र जीवन में नीरज कुमार (हाईकोर्ट पटना में द्वितीय श्रेणी का कर्मचारी) और आलोक रेजन (फिसडी देहली में रसायन शास्त्र के प्रोफेसर) इनके दो करीबी मित्र हुआ करते थे, जिन्होंने संघर्ष के दिनों में इनका भरपुर सहयोग किया।
आनर्स की पढ़ाई पूरी करने के पश्चात यह अपने घर वापस आ गए और घर घर जाकर ट्यूशन पढ़ाने का कार्य करने लगे। इसी दौरान प्रखंड समन्वयक आशुतोष चौधरी ने इन्हें बिहार सरकार के साक्षरता अभियान में सकरेली पंचायत का सचिव नियुक्त किया। एक सक्रिय साक्षरता कर्मी के रूप में इन्होंने ग्रुप बना कर अनपढ़ लोगों को साक्षर बनाने का भरपूर प्रयास किया। मनुष्य के सर्वांगीण विकास के लिए खेल को भी श्री तिवारी काफी महत्त्वपूर्ण मानते थे, इसलिए 1996 में मधुबनी क्रिकेट टूर्नामेंट का आयोजन प्रारंभ किया। 1998 में इन्होंने मधुबनी स्थित अपने आवास पर हंस एंड भवानी कोचिंग सेंटर का स्थापना किया। यह इस क्षेत्र के बच्चों के लिए वरदान साबित हुआ। सेमापुर स्थित प्रतिष्ठित जे एन सी उच्च विद्यालय में माध्यमिक बोर्ड परीक्षा में पिछले कई वर्षों से गणित का टॉपर इनका ही छात्र होता रहा है। बालकृष्ण पटेल (पंचायत राज सकरेली का वर्तमान मुखिया), रविशंकर निर्मल (रेलवे कर्मचारी), संतोष कुमार संतोषी (लोको पायलट), मीनू कुमारी (शिक्षिका), अमर कुमार अकेला (शिक्षक), राजेश कुमार मंडल (एक्साइज विभाग में कार्यरत), आनंद कुमार सिंह (एसबीआई स्टाफ) आदि जैसे सफल छात्रों को शुरुआती दौर में तराशने का कार्य भी श्री तिवारी ने ही किया है। अपने कोचिंग कैंपस में माता सरस्वती का मंदिर स्थापित कर तन मन धन से उनकी सेवा में समर्पित श्री तिवारी अपने संस्थान के बच्चों में किताबी ज्ञान से ज्यादा उसके चरित्र निर्माण पर बल देते हैं। समय समय पर सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन कर बच्चों के व्यक्तित्व और संप्रेषण क्षमता का विकास करने के कारण आज इनके छात्र छात्राओं द्वारा अपने जीवन के कर्म क्षेत्र में काफी बेहतर कार्य किया जा रहा है। श्री तिवारी का यह पूर्ण विश्वास है कि सृष्टि के हर जीव में भगवान का वास है, इसलिए यह मांसाहार से दूर रहते हैं और अपने आवास में रहने वाले सभी बच्चों को तामसिक भोजन से दूर रहने के कठोर नियम का सख्ती से पालन करवाते हैं। गौरतलब है कि इनके आवास पर सैकड़ों गरीब परिवार के बच्चों ने बिना किसी शुल्क के कई वर्षों तक रह कर शिक्षा प्राप्त करते आए हैं। इनकी विचारधारा से सभी धर्म के मानने वाले लोग काफी प्रभावित होते हैं, यही कारण है कि मुस्लिम समुदाय द्वारा आयोजित किए जाने वाले जलसों में भी इन्हें वक्ता के रूप में आमंत्रित किया जाता है। श्री तिवारी भी अपने चाहने वालों को निराश नहीं करते हैं और अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद सामाजिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों में इनकी सक्रिय सहभागिता रहती है। अपने संस्थान के बच्चों के साथ भी इनका एक भावनात्मक जुड़ाव और पारिवारिक संबन्ध कायम हो जाता है।
स्वामी विवेकानंद को अपना आदर्श मानने वाले श्री तिवारी को अपने कालेज लाइफ से सभी धर्मों के धार्मिक किताबों का पढ़ने का शौक है। पांच मई 2000 को श्रीमती रानी तिवारी से वैवाहिक बंधन में बंधने वाले श्री तिवारी अपने बच्चों साध्वी कुमारी, कुमार गौरव, कुमार नैनम और कुमार श्वेतांसु के लिए भी पर्याप्त समय निकालने का पूरा प्रयास करते हैं।
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