10. गौरीशंकर चौधरी

गौरी शंकर चौधरी बरारी के सत्ता के गलियारों में सम्मान से लिया जाने वाला वह नाम है जिसने भले ही कोई बड़ा चुनाव नहीं जीता हो लेकिन बरारी विधानसभा के छोटे बड़े सभी राजनेताओं के मन में उनके लिए एक खास सम्मान है। FC अतीत की गहराइयों में डूब कर अपने मामा रूपलाल चौधरी का भोला शंकर बतलाते हैं कि 1990 और 1995 में भाजपा से बरारी विधानसभा के लिए उनकी उम्मीदवारी लगभग तय थी लेकिन कुछ अपनी आर्थिक परेशानियों और कुछ विभाष चंद्र चौधरी के आग्रह पर उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की दावेदारी वापस ले ली। वक्त के साथ पार्टी और पार्टी कार्यकर्ता के रूप में उनका कद काफी ऊंचा हुआ लेकिन विधायक बनने का उनका सपना अधूरा ही रह गया। गौरी शंकर बाबू का जन्म 14 अप्रैल 1947 को मुजफ्फरपुर जिला के कटरा थाना के अंतर्गत आने वाले बरहज गांव में हुआ था। पारिवारिक विवादों के कारण 1955 में वह भवानीपुर पंचायत के सहरिया गांव अपने दादाजी के पास आ गए। उनके दादाजी सहरिया में तंबाकू की खेती और तंबाकू का व्यापार करते थे। तभी भवानीपुर पंचायत काफी संपन्न और समृद्ध पंचायत था लेकिन गंगा के कटाव ने यहां के सभी लोगों कि जिंदगी बद से बदतर बना डाला। वैसे गंगा का कटाव तो 1956 से ही चरम पर था लेकिन 1965 में गौरी शंकर बाबू के शादी के कुछ ही दिनों बाद उनका घर भी कटाव की भेंट चढ़ गया। इसी वर्ष उन्होंने मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की थी और फ़िर वक्त और हालात ने उन्हें आगे पढ़ने का कोई मौका नहीं दिया। कटाव की पीड़ा को अभिव्यक्त करते हुए उनकी आंखें अनायास ही डबडबा जाती है। खुद को संभालते हुए बतलाते हैं कि कई सौ बीघा जमीन का जमींदार भूमिहीन मजदूर बन जाता है और दाने दाने के लिए मोहताज हो जाता है। खेती नष्ट होने से लोग भुखमरी के शिकार होने लगते हैं। कई बार अपना आश्रय बदलने के बाद भी जब कटाव के त्रासदी से राहत नहीं मिली और 1971 की बाढ़ ने जब इस त्रासदी को और भी ज्यादा भयानक बना दिया तब वह अपनी धर्मपत्नी श्रीमती आंवला देवी को लेकर किशनगंज चले जाते हैं। यहां वह स्टेशनरी की छोटी सी दुकान कर किसी प्रकार अपने परिवाजनों का भरण पोषण करते हैं। 1971 में उनके लिए सबसे सुखद दिया रहता है कि उनकी धर्मपत्नी का चयन शिक्षिका के रूप में हो जाता है और उनकी पोस्टिंग मनिहारी के मेदनीपुर गांव में हो जाती है। जिस जमाने में महिला मजदूर को चार आने और पुरुष मजदूर को एक रुपया दैनिक मजदूरी मिलती है उस समय उनकी धर्मपत्नी को ₹120 मासिक वेतन सरकार द्वारा मुकर्रर किया जाता है। यहां से उनकी जीवन की नैया थोड़ा पटरी पर आती है।

राजनीति में आने की प्रेरणा के बारे में पूछे जाने पर वह अपनी मां स्वर्गीय पार्वती देवी का नाम काफी श्रद्धा से लेते हैं। गौरी शंकर बाबू बताते हैं कि उनकी मां अक्सर उन्हें दूसरों की समस्याओं के लिए लगातार संघर्ष करने के लिए प्रेरित करती थी हालांकि उनके पिताजी स्वर्गीय रामस्वरूप चौधरी इस प्रकार के बेगारी को बिल्कुल भी पसंद नहीं करते थे। कटाव से पूर्व 1958 में पृथ्वी चंद्र यादव के द्वारा भवानीपुर में ही एक कीर्तन मंडली का निर्माण होता है जिसमें गौरी शंकर बाबू की भूमिका काफी अहम होती है। लोगों के नेतृत्व की क्षमता का विकास उनमें यहीं से होता है। उन्हें बचपन से ही गाने बजाने का शौक था और राम धुन, अखंड पाठ, और कीर्तन-भजन उन्हें विशेष आनंद प्राप्त होता था।

धर्मपत्नी श्रीमती आंवला देवी का शिक्षिका के रूप में मनिहारी के मेदिनीपुर में नियुक्ति होने के पश्चात उनका संपर्क 1971 में ही जनसंघ के शिवेंद्र नाथ मेवाड़, पवित्रो चौधरी, विश्वनाथ चौधरी, दिन मणि चौधरी आदि से होता है। इन लोगों के संपर्क में आकर वह अक्सर आजमपुर गोला स्थित आर एस एस के शाखा में जाने लगते हैं और वहीं से उनके अंदर हिंदुत्व की सुरक्षा की भावना का विकास होता है। इसके पहले भी 1968 में बराड़ी के सर्वोदय आश्रम में ग्रामदान अभियान में एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में वह कार्य करते हैं। विद्यालय जाकर विलायती दूध बनवाना और बच्चों के बीच बटवाना समय-समय पर कपड़ा और अन्य जरूरी सामान गरीब बच्चों के बीच वितरण करना आदि जैसे कार्यों को निपुणता से पूरा कर उन्होंने अपनी एक खास पहचान बना रखा था लेकिन ₹60 के मामूली वेतन में मधुबनी ट्रांसफर होने के बाद पिता के दबाव में उन्हें यह कार्य छोड़ना पड़ा। 1974 में जनसंघ के प्रखंड स्तरीय लीडर जगरनाथ पोद्दार के संपर्क में आकर उन्होंने जे पी के इंद्रा भगाओ देश बचाओ आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। 1977 में लोकसभा चुनाव में पूर्णिया लोकसभा से जनता पार्टी के उम्मीवार हलिमूद्दिन के लिए किशनगंज में सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई और बूथ एजेंट एवं मत गणना एजेंट के रूप में कार्य किया। हलिमुद्दिन जी चुनाव में विजय हुए और केंद्र में मोरारजी देसाई के नेतृत्व में सरकार बनी।

6 अप्रैल 1980 को जनता पार्टी से ही भारतीय जनता पार्टी का निर्माण हुआ और जगरनाथ पोद्दार कटिहार के प्रथम जिलाध्यक्ष बनाए गए। इसी बीच 1981में उनकी धर्मपत्नी का स्थानांतण बरारी हो जाता है और वह मन ही मन राजनीति से दूर रहने का संकल्प लेते हैं। बरारी के ठाकुरबाड़ी में बुजुर्गों के द्वारा भोला नाथ किंकर द्वारा संचालित अखिल भारतीय मानस संघ में मंत्री की भूमिका निभाई और बारी नगर के सभी घरों में अखंड पाठ करवा कर इसे आदर्श पंचायत घोषित करवाया। बरारी के तत्कालीन प्रखंड विकास पदाधिकारी सुरेंद्र शुक्ल के आग्रह पर स्वतंत्रता सेनानी नरेश चौधरी, छोटू भगत, सुंदर लाल पोद्दार, श्रवण चौधरी आदि के सहयोग से ठाकुर बाड़ी में नवरात्रा, अष्ट जाप, चंडी पाठ, रामायण पाठ, नोका परायण आदि का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के उद्घाटन के लिए तत्कालीन कटिहार के एसडीओ राधेश्याम बिहारी आए हुए थे। इस कार्यक्रम के संयोजक के रूप में गौरीशंकर बाबू के कार्य से विश्व हिंदु परिषद के त्रिलोकीनाथ बागी इतने प्रभावित हुए कि शिक्षक राधा नाथ चौधरी की अनुशंसा पर 1989 में इन्हें बहुचर्चित आयोध्या राम मंदिर निर्माण के लिए शीला पूजन कार्यक्रम हेतु बरारी का प्रखंड मंत्री नियुक्त किया गया। डाक्टर जनार्दन प्रसाद को अध्यक्ष एवं गोपाल अग्रवाल को कोषाध्यक्ष नियुक्त किया गया। शीला पूजन कार्यक्रम से जोड़कर वर्तमान सांसद दुलाल चन्द्र गोस्वामी को जोड़कर गौरीशंकर बाबू ने उन्हें सार्जनिक जीवन से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और आगे चलकर वह बलरामपुर से विधायक भी चुने गए। 1990 में भाजपा और भाजपा के वरिष्ठ नेता जगबंधु अधिकारी द्वारा इन्हें बरारी के विधानसभा चुनाव हेतु भाजपा उम्मीवार के रूप में तैयार रहने को कहा गया था लेकिन आर्थिक परेशानी और विभाष चन्द्र चौधरी के लगातार आग्रह के कारण उन्होंने भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष ठाकुरप्रसाद और भाजपा के वरिष्ठ नेता कैलाश पति मिश्र को एक पत्र लिखकर बरारी से विभाष चन्द्र चौधरी को बरारी का भाजपा उम्मीदवार बनाए जाने की अनुशंसा की थी। इसके साथ ही शिवेंद्र नाथ मेवाड़ को मनिहारी और निखिल चौधरी को कटिहार सादर से उम्मीदवार बनाए जाने का अनुरोध इनके द्वारा किया गया था।

जीवन के अंतिम पड़ाव में अपने जीवन की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए गौरीशंकर बाबू कहते हैं कि 2005 में वह बरारी के बीस सूत्री के अध्यक्ष बनाए गए। खगड़िया संसदीय क्षेत्र से समता पार्टी के विजय उम्मीदवार शकुनि चौधरी और जदयू उम्मीदवार रेणु चौधरी के चुनाव प्रभारी के रूप में उन्होंने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। 2000 में भाजपा बरारी के प्रखंड अध्यक्ष बनाए जाने से पहले वह दो टर्म लगातार भाजपा बरारी के महासचिव की भूमिका निभाई। भले हीं विधायक बनने का उनका सपना अधूरा रह गया हो लेकिन पूर्व विधायक विभास चन्द्र चौधरी सहित कई अन्य लोगों को विधानसभा और संसद तक पहुंचाने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही है। बरारी के विकास के लिए वह सत्तासीन राजनेताओं से बरारी को भागलपुर से जोड़ने वाले पुल का गंगा नदी पर यथाशीघ्र निर्माण चाहते हैं। मनिहारी से कुर्सेला भाया काढ़ागोला रेलवे लाईन बिछाकर काढ़ागोला को जंक्शन की मान्यता दिए जाने की वकालत करते हैं और बरारी के चहमुखी विकास के लिए बरारी को अनुमंडल बनाया जाना जरूरी समझते हैं।

अपनी ईमानदारी की छोटी सी कमाई से पूर्णतः संतुष्ट गौरीशंकर बाबू की तीन पुत्रियां संगीता चौधरी, अनीता चौधरी और आलोक चौधरी सफल वैवाहिक जीवन यापन कर रही है। बड़ा पुत्र संजय कुमार सचिवालय के वित्त विभाग में कार्यरत हैं और छोटा पुत्र राजीव रंजन  एम बी ए कर बैंगलोर के एक बड़ी कंपनी में कार्यरत हैं। उनकी एक पोत्री नवोदय विद्यालय में अध्यनरत है। अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में अंतिम सांस तक वह गरीब लोगों और जरूरतमंद लोगों के सहयोग के स्वयं को न्योछावर करने में अपने जीवन को सार्थक मानते हैं।

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