6. उषा जायसवाल (के. आर. पी.)

उषा जायसवाल बरारी की महिलाओं के सशक्तिकरण और एक समर्पित शिक्षका के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। महान वीरांगना झांसी की रानी को अपना आदर्श मानने वाली श्रीमती जायसवाल समाज और विशेषकर महिलाओं के लिए जीवन के कठिन उतार - चढ़ाव के बीच संघर्ष की अद्भुत मिशाल है। के. आर. पी. और शिक्षिका की दोहरी भूमिका के साथ साथ विशेष शिक्षा, अनोपचारिक शिक्षा, वयस्क शिक्षा, रात्रि पाठशाला, टोला सेवक की ट्रेनर, साक्षरता दूत आदि के अलावा सभी प्रकार सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यक्रमों में सक्रिय भूमिका निभाने वाली श्रीमती जायसवाल आज बरारी के आम लोगों के लिए एक परिचित नाम है। इनका जन्म पांच जुलाई 1966 को एक शिक्षक दंपत्ति के यहां वर्तमान कुर्सेला प्रखंड के मजदिया गांव में हुआ था। इनकी माताजी स्व. कुशुमा देवी (शिक्षिका) और स्व. पंचानंद भगत (शिक्षक) राजकीय बुनियादी विद्यालय टीकापट्टी में कार्यरत थे। दो भाई बहन में छोटी श्रीमती जायसवाल बचपन से अपने पिता बहुत लाडली थी। इनकी प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा उसी विद्यालय से हुई जहां इनके माता पिता नियुक्त थे। आगे चलकर इन्होंने जी. जी. एम. पी. स्कूल पूर्णिया से मैट्रिक की परीक्षा पास किया माता। इनके  पिता दोनों  इन्हें उच्च शिक्षा देकर सरकार नौकरी में देखना चाहते थे लेकिन घर - परिवार और आस पड़ोस के दवाब के कारण कम उम्र में जरलाही (मधेलि) के एक जमींदार परिवार में श्री राजकुमार चौधरी से इनका विवाह कर दिया गया। कुल अस्सी बीघा ज़मीन के मालिक श्री चौधरी फिजिक्स ऑनर्स के बावजूद उनकी माताजी ने शिक्षक की नौकरी नहीं करने दिया क्योंकि उस समय शिक्षकों का वेतन डेढ़ सौ रुपया मासिक था जबकि इसका चार गुणा उनके परिवार द्वारा नौकरों कको तनख्वाह के रूप में हर माह बांट दिया जाता था।

1980 में मिनी कलकत्ता के नाम से प्रसिद्ध जरालाही जब कटाव के कारण गंगा मां के गर्भ में समा गया तो चार बच्चों की मां श्रीमती जायसवाल गंभीर रूप से डिप्रेशन की शिकार हो गई। शादी के समय मां से उपहार के रूप में मिली राशि से इन्होंने बरारी प्रखंड कार्यालय के समीप एक जमीन का टुकड़ा खरीद रखा था। बड़ी मुश्किल से सर छिपाने के लिए एक आशियाना तो खड़ा हो गया लेकिन घर गृहस्थी चलाने के लिए नियमित आय नहीं होने के कारण वह काफी चिंतित रहती थी। इस दौरान कुछ समय इन्होंने अपने पिता के घर रह कर गुजारा किया। पिता ने अपनी लाडली बेटी की परेशानी को देखते हुए मोहिद ट्रेलर मास्टर को अपने निजी आवास पर इस शर्त पर आश्रय दिया कि वह उनकी बेटी को सिलाई कढ़ाई के कार्य में व्यस्त रख कर उसे डिप्रेशन से निकालने का कार्य करेंगे। काफी प्रयास के बाद मोहीद मास्टर अपने मिशन में सफल हो गए। सिलाई कढ़ाई का यह प्रशिक्षण श्रीमती जायसवाल के जीवन में एक नया सूर्योदय लेकर आया। 1988 में अपनी बड़ी सुपुत्री के नाम से नूतन सिलाई सेंटर खोल कर उन्होंने प्रखंड के तीन हज़ार से ज्यादा लड़कियों और महिलाओं को सिलाई कढ़ाई का प्रशिक्षण दिया। इस बीच उन्हें सरकार द्वारा संचालित ट्रायसम योजना के अंतर्गत प्रशिक्षक बनने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। 2007 में नीतीश सरकार के द्वारा बड़े पैमाने पर शिक्षक बहाली का विज्ञापन जारी किया गया। प्रशिक्षित होने के कारण इन्हें भी शिक्षका बनने का अवसर प्राप्त हो गया।इसी बीच मां बेटी के द्वारा अंकुर साक्षरता मिशन में निस्वार्थ भावना से शिक्षा के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण बिहार सरकार के प्रधान सचिव आरके महाजन के द्वारा इनका चयन केआरपी के रूप में भी किया गया।

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