13. प्रेमनाथ जायसवाल
बरारी हाट पर स्थित प्रसिद्ध भगवती मंदिर के सामने भव्य दूर्गा मंदिर का निर्माण कर माता के अष्टधातु की प्रतिमा स्थापित करने वाले बरारी के पूर्व विधायक प्रेमनाथ जायसवाल का नाम आज भी हर कोई सम्मान से लेता है। माता दुर्गा के उपासक श्री जायसवाल अपनी ईमानदारी और गरीबों, पिछड़ों और दलितों की सशक्त आवाज के रूप में राजनीतक गलियारों में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। यही कारण है कि राजद सुप्रीमो एवं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव एवं उनकी धर्मपत्नी श्रीमती राबड़ी देवी इन्हें सदैव महात्मा के नाम से पुकारते रहे हैं। प्रतिदिन अपने दोनों हाथों और पैरों के तलवों को लाल सिंदूर से रंगने वाले और खास तरह के इत्र का प्रयोग करने वाले श्री जायसवाल का जन्म 14 जुलाई 1947 को 3000 बीघा ज़मीन के मालिक बलुआ स्टेट के स्वर्गीय बील्टू चोधरी के प्रपौत्र के रूप में हुआ था। इनकी माता का नाम स्वर्गीय रामपड़ी देवी है। इनके पिताजी का नाम स्वर्गीय बालेश्वर चौधरी है, जिन्हें आजीवन अपने पंचायत का मुखिया बने रहने का सौभाग्य प्राप्त था। अपने माता पिता के नौ संतानों में तीसरे नंबर पर आने वाले श्री जायसवाल बहुत कम उम्र से गरीबों और दबे कुचले लोगों की समस्याओं के समाधान हेतु पदाधिकारियों से उलझने का साहस रखते थे।
1963 में जब बिहार के मुख्यमंत्री के. बी. सहाय थे, छात्र आंदोलन के दौरान रांची में कुछ छात्रों की पुलिस कार्रवाई में मौत हो गई। इसके बाद हुए राज्यव्यापी आंदोलन से प्रभावित होकर श्री जायसवाल ने अपने कुछ साथियों के साथ बरारी प्रखंड कार्यालय में न सिर्फ काला झंडा फहराया बल्कि बरारी थाना के नजदीक का रेलवे ढाला का फाटक बंद कर सड़क आवागमन अवरुद्ध कर दिया था। इस कारण इन्हें पुलिस ने गिरफ़्तार भी कर लिया था। यह राजनीति और समाजसेवा के क्षेत्र में इनकी पहली गिरफ्तारी थी। 1964 में इन्होंने गरबनैली कस्बा, पूर्णिया से मैट्रिक किया। इसके बाद 1968 में पूर्णिया कॉलेज पूर्णिया से इंटर की पढ़ाई साइंस विषय से पूरी की। इसी कॉलेज से 1973 में इन्होंने बी. एस. सी. की डिग्री भी प्राप्त की। दरअसल अपेंडिक्स के ऑपरेशन और बीमारियों से ग्रस्त होने के कारण यह नियमित रूप से पढ़ाई नहीं कर पाए थे। बचपन से स्वाभाव से ईमानदार प्रवृति के होने के कारण इन्हें भगवती मंदिर बरारी में व्याप्त भ्रष्टाचार बिल्कुल भी पसंद नहीं आया। अतः इनके नेतृत्व में युवाओं की टीम ने पूर्व के कमेटी का विरोध कर दिया। श्री जायसवाल ने मंदिर के ठीक सामने माता दुर्गा का एक दूसरा मंदिर बनाने का निर्णय ले लिया। जिसके फलस्वरूप 1965 में इन्हें मंदिर कमेटी का अध्यक्ष बनाया गया लेकिन इसके बावजूद इनके द्वारा एक अन्य मंदिर बनाने के निर्णय में जब बदलाव नहीं आया तो इनके पिताजी के अध्यक्षता में बुजुर्गों की एक अन्य मंदिर कमेटी बनाई गई लेकिन इनके पिताजी भी इन्हें एक अन्य दुर्गा मंदिर बनाने से नहीं रोक पाए। 1977 में पहली बार इन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार (तांगा छाप) के रूप में बरारी विधानसभा से चुनाव लड़ा। सफलता तो इन्हें नहीं मिली लेकिन अपने क्षेत्र के लोगों को इन्होंने काफी प्रभावित किया। 1982 में पुनः निर्दलीय उम्मीदवार (हाथी छाप) से चुनाव लड़ कर तीसरे स्थान पर रहे। 1984 में भारत के पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंद्रा गांधी से दिल्ली जा कर इन्होंने मुलाकात किया। श्रीमती गांधी ने इन्हें टिकट देने का भी आश्वासन दिया था लेकिन बाद में पार्टी ने इन्हें टिकट देने से इंकार कर दिया। 1985 के विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी (शेर छाप) के रूप में चुनाव लड़ा, हालांकि इन्हें जनता का पूर्ण आशीर्वाद तो प्राप्त नहीं हुआ लेकिन इस बार श्री जायसवाल दूसरे स्थान पर रहे। 1990 में निर्दलीय उम्मीदवार (ऊंट छाप) से जब इन्होंने नामांकन पत्र दाखिल किया तो इस बार बरारी के गरीब - दलित, बूढ़ा - जवान, महिला - पुरुष सभी वर्ग के लोगों ने इनका खुल कर समर्थन किया और चौदह हज़ार वोटों से इन्होंने चुनाव में जीत हासिल किया। इस चुनाव के दौरान बूथ केपचर और बेलेट बॉक्स बदले जाने के अफवाहों के बीच लगभग दस हज़ार से ज़्यादा श्री जायसवाल के समर्थकों ने बरारी थाना को घेर लिया था। इस कारण बी. एस. एफ. के जवानों और इनके समर्थकों के बीच मामूली झड़प भी हो गई थी। विधायक बन कर श्री जायसवाल ने लालू यादव को मुख्यमंत्री बनाने के लिए बिना शर्त समर्थन दिया। इनके साथ समर्थन देने वालों में बत्तीस अन्य निर्दलीय उम्मीदवार भी थे। उस समय विधायक को सिर्फ तीन लाख रुपए प्रतिवर्ष क्षेत्र के विकास के लिए फंड दिया जाता था। अपने विधायक फंड से इन्होंने रोनिया, हुसैना, कुर्सेला, तिंघरिया आदि सहित कई जगहों पर पहली बार पक्की सड़कों का निर्माण करवा कर सुदूर ग्रामीण इलाकों के लोगों को आवागमन की सुविधा उपलब्ध कराने का कार्य किया। इस दौरान इन्होंने कई छोटे पुल पुलियों का भी निर्माण करवाया। जायसवाल टैक्सटाइल की स्थापना भी इनकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धि थी, जिसमें जनता साड़ी धोती और कुर्ता का निर्माण होता था लेकिन बिजली के अभाव में यह फैक्ट्री बन्द हो गई। आज की पीढ़ी को शायद ही यह मालूम होगा कि काढ़ागोला रेलवे स्टेशन पर दानापुर और महानंदा एक्सप्रेस का ठहराव भी इनके प्रयास से संभव हो पाया था। विधायक रहते हुए अपने मोहल्ले में जल निकासी के लिए नाला निर्माण हेतु यह तात्कालिक जिलाधिकारी श्रीमती रश्मि वर्मा से मिलने उनके कार्यालय गए थे। कार्यालय में जिला पदाधिकारी द्वारा गलत व्यवहार किया गया, जिसे इन्होंने विधानसभा में उठा दिया और श्रीमती रश्मि वर्मा को विधानसभा सत्र के दौरान उपस्थित होकर श्री जायसवाल से सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी पड़ी। इससे पूर्व 1971 के बाढ़ के बीच राहत सामग्री बांटने में लापरवाही बरतने के कारण तात्कालीन बरारी बी. डी. ओ. जे. पी. राय से भी श्री जायसवाल भीड़ गये थे। 1988-89 में जब कुछ लोगों द्वारा बरारी हाट के डाक में कटिहार के अनुमंडल पदाधिकारी राधे श्याम बिहारी सिंह द्वारा निष्पक्ष रूप से कार्य नहीं करने का आरोप लगाया गया तो उस समय भी यह उनसे उलझने के कारण आठ दिनों के लिए गिरफ़्तार कर लिये गए थे। गिरफ़्तार होने के बाद इन्होंने जेल में ही अनशन प्रारंभ कर दिया था।
1995 में एक बार पुनः इन्हें लालू जी के पूर्ण आश्वासन के बावजूद पार्टी से टिकट नहीं दिया गया लेकिन निर्दलीय प्रत्याशी (गुड्डा गुड्डी छाप) से इन्होंने चुनाव लड़ा। 2000 में नीतीश कुमार के समता पार्टी से मशाल छाप से भी इन्होंने चुनाव लड़ा। आख़री बार 2015 में गुब्बारा छाप से इन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा। इन चुनावों में लगातार हार के बावजूद स्थानीय लोगों का इनसे प्यार और स्नेह कम नहीं हुआ। यही कारण है कि 2001 और 2006 में इन्हें बरारी पंचायत से इनके समर्थकों ने मुखिया का चुनाव लड़ने को विवश कर दिया। 2001-06 में स्वयं इन्हें और 2006-11 में इनकी धर्मपत्नी श्रीमती चंद्रकांता देवी को ग्राम प्रधान बनने का सौभाग्य प्राप्त है। अपने पांच दशक के राजनीतिक सक्रियता के बीच पूर्व मुख्यमंत्री लालू यादव, जग्गनाथ मिश्रा, और श्रीमती राबड़ी देवी से इनकी काफी घनिष्ठता रही। राज्य सभा सांसद सुबोधकांत सहाय, पूर्व प्रधानमंत्री इंद्र कुमार गुजराल, पूर्व राज्यसभा सांसद नरेश यादव के अलावा कई कद्दावर नेताओं ने इनकी सादगी और ईमानदारी को खूब सराहा। अपने दोनों जवान सुपुत्र शेखर जायसवाल और रूपेश जायसवाल को बीमारी के कारण खो देने से अब इन्होंने ख़ुद को मां दुर्गा की सेवा में समर्पित कर दिया है। 2018 में इनकी धर्मपत्नी श्रीमती चंद्रकांता देवी ने भी एक लम्बी बीमारी के बाद इनका साथ छोड़ दिया है। इनकी बड़ी बेटी रूपा जायसवाल और छोटी बेटी नीतू जायसवाल अपने वैवाहिक जीवन से समय निकाल कर अपने पिता की सेवा करती है।
Comments
Post a Comment