16. जनाब मंसूर आलम

1971 के बाढ़ की भयानक त्रासदी के पश्चात बरारी विधानसभा में विस्थापितों और कटाव पीड़ित लोगों की समस्या काफी जटिल हो गई थी। ऐसे ही समय में बरारी विधानसभा के लोगों ने पूर्व मंत्री जनाब मंसूर आलम को अपनी समस्याओं के समाधान की उम्मीद में विजयी बनाकर सदन में भेजा था। जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरने के प्रयास में बिहार के सत्ता के गलियारों में इन्हें ठोकर मंत्री के नाम से भी प्रसिद्धि मिली थी। दरअसल यह अक्सर मंत्रीमंडल से गंगा और कोशी नदियों पर ठोकर की मांग करते रहते थे। इनका जन्म 22 सितंबर 1942 को किसान परिवार में जगदीशपुर बदुआ टोला में हुआ था। इनकी अम्मी का नाम स्वर्गीय बीबी फातिमा है। इनके वालिद का नाम स्वर्गीय सोहराब अली है। मंसूर साहब के जन्म के कुछ दिनों बाद ही इनके वालिद का इंतकाल हो गया। इसके पश्चात इनकी अम्मी अपने तीन लड़कों और एक लड़की के साथ अपने पिता के घर कठौतिया चली आई। मंसूर साहब और उनके दोनों भाई और एक बहन का लालन पालन इनके नाना हाजी कियामतुल्लाह और निःसंतान मामा हाजी अब्दुर्र रहमान के द्वारा किया गया। अपने सभी भाई-बहनों में सबसे छोटे मंसूर साहब बचपन से एक मेधावी छात्र थे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा मदरसा इस्लाहिया आज सेमापुर से हुई। 1958 में यहां से फोकानिया की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात इन्होंने दरभंगा के मदरसा अहमदिया सलफिया से 1960 में मौलवी और 1962 में आलिम की डिग्री प्राप्त किया। 1962-64 के शेषन में मदरसा शमसुल होदा पटना में फाजिल ए पार्सियन में प्रवेश लिया लेकिन कुछ कारणवश इसे पूरा नहीं कर पाए। धार्मिक पढ़ाई को उस समय सरकारी नौकरी में मान्यता प्राप्त नहीं होने के कारण इन्होंने 1963 में जिला स्कूल पटना में मैट्रिक परीक्षा पास किया। भागलपुर विश्वविद्यालय में प्री इंटर की प्रवेश परीक्षा में इन्होंने संपूर्ण बिहार में विश्वविद्यालय में तीसरा स्थान प्राप्त कर डीएस कॉलेज में दाखिला लिया। 1965 में डी. एस. कॉलेज से राजनीति शास्त्र से इंटर करने के पश्चात इन्होंने 1967 में भागलपुर विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक की डिग्री भी प्राप्त किया। पटना विश्वविद्यालय के लॉ कॉलेज से 1969 में एलएलबी की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात यह वापस कटिहार आकर व्यवहार न्यायालय कटिहार में अपना वकालत प्रारंभ कर दिया। इनके मामा हाजी अब्दुर्र रहमान को ऐसा लगता था कि वकालत के काम बहुत झूठ बोलना पड़ता है, इसलिए उनके द्वारा आपत्ति जताए जाने के कारण एक वर्ष पश्चात ही इन्हें वकालत का पेशा छोड़ना पड़ गया। 1971 में बाढ़ की भयानक त्रासदी के पश्चात समाजसेवा में इनकी रुचि उत्पन्न हो गई है। अपने आसपास के लोगों का यथासंभव मदद करने की प्रवृत्ति के कारण गांव वाले और विशेष रूप से इनके मौसेरा भाई अब्दुल्ला मौलवी इन्हें चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहते थे। इसी बीच 1977 में शेरशाहवादियों के तत्कालीन स्थापित नेता मोहम्मद शकूर साहब अपना चुनाव क्षेत्र बदल कर प्राणपुर चले गए। फलस्वरुप 1977 में मंसूर साहब ने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मछली छाप चुनाव चिह्न से पहली बार चुनाव लड़ा कांग्रेस के बुजुर्ग नेता बासुदेव सिंह से पराजित हो गए। 1980 में एक बार इन्होंने फिर से निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में हाथी छाप से अपना भाग्य आजमाया लेकिन इस बार भी कांग्रेस के उम्मीदवार करूनेश्वर सिंह से पराजित हो गए। दो बार लगातार चुनाव हारने के पश्चात इन्होंने अपने मामा हाजी अब्दुर्र रहमान और ससुर एवं कठौतिया के तात्कालीन मुखिया अनिसुर रहमान  के प्रयास से उनकी निजी जमीन में स्थापित मदरसा बोर्ड से मान्यता प्राप्त दारुल होदा मदरसा में शिक्षक के रूप में अपनी सेवा देने लगे। इसी बीच स्वर्गीय तूफानी यादव एवं रोनिया के पूर्व मुखिया स्वर्गीय सच्चिदानंद यादव ने इनका संपर्क श्री कर्पूरी ठाकुर से करवाया। श्री ठाकुर इन से काफी प्रभावित हुए और इन्होंने 1985 के चुनाव में दलित मजदूर किसान पार्टी से बरारी विधानसभा के लिए इन्हें अपना उम्मीदवार भी बनाया। इस प्रकार खेत जोतता हुआ हलधर किसान चुनाव चिह्न से मंसूर साहब लगभग 5000 मतों से चुनाव जीतकर पहली बार विधानसभा पहुंचे। 1990 में भी चक्का छाप से इन्होंने चुनाव लड़ा लेकिन निर्दलीय उम्मीदवार प्रेमनाथ जायसवाल से चौदह सौ वोटों से यह पराजित हो गए। 1995 में उन्होंने राजद के लालटेन छाप से चुनाव लड़ कर पूर्व सांसद एवं बिहार के लोकप्रिय नेता पप्पू यादव की पत्नी रंजीता रंजन को पराजित किया। विधायक बनकर इन्होंने बांग्ला भाषी लोगों को बांग्लादेशी घुसपैठ कह कर समाज और मीडिया के लोगों के द्वारा अपमानित करने की बात लालू यादव के समक्ष उठाया। श्री यादव ने इस समस्या के समाधान हेतु बांग्ला भाषी लोगों को शेरशाहवादी अल्पसंख्यक समुदाय का दर्जा दिया और उन्हें आरक्षण भी प्रदान किया। 1997 में जब लालू यादव को जेल जाना पड़ा तो उन्होंने राबड़ी देवी को मुख्यमंत्री बना दिया। इसी समय इन्हें सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के मंत्री के रूप में राबड़ी देवी के मंत्रिमंडल का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। 2000 में भी राजद के लालटेन छाप से चुनाव लड़ कर इन्होंने भाजपा उम्मीदवार एवं बाद में दो बार विधायक रहे विभाष चन्द्र चौधरी को पराजित कर आखरी बार विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज किया था। इस बार इन्हें पुनः अल्पसंख्यक कल्याण के मंत्री के रूप में कैबिनेट का हिस्सा बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री रहते हुए इनके द्वारा कटिहार, किशनगंज, अररिया, सहरसा, सुपौल आदि सहित कई जिलों में माइनॉरिटी छात्रावास की स्थापना किया गया। 2005 फरवरी के चुनाव में इन्होंने राजद के टिकट पर अपना भाग्य आजमाया था लेकिन शकूर साहब से इन्हें पराजित होना पड़ा। अपने राजनीतिक जीवन में इन्हें रांची और हाजीपुर में बीस सूत्री प्रभारी बनने का भी सौभाग्य प्राप्त हुआ। देश और राज्य की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण विधायक को अपने क्षेत्र के विकास के लिए बहुत कम राशि उपलब्ध कराया जाता था। अपने विधायक को उसी अल्प फंड से इन्होंने विधानसभा के अंतर्गत आने वाले सभी विद्यालयों के लिए भवन उपलब्ध कराने का प्रयास किया। इसके अलावा कई जगहों पर ईट सोलिंग और पीडब्ल्यूडी के अंतर्गत पक्की सड़क के निर्माण का भी कार्य किया गया। चरखी मोड़ से शिशिया और कालीकापुर मोड़ से डूमर तक के सड़क का पक्कीकरण पहली बार उनके प्रयास नहीं हो पाया था।

पांच दशक के अपने राजनीतिक जीवन में इन्हें बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री सर्व श्री कर्पूरी ठाकुर, लालू प्रसाद यादव और श्रीमती राबड़ी देवी का भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ। राजद के वरिष्ठ नेता जगदानंद सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश सिंह, सीमांचल के गांधी एवं पूर्व मंत्री मोहम्मद तस्लीमुद्दीन एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री अब्दुल बारी सिद्धकी सहित कई दिग्गज और कद्दावर नेताओं के करीबी रहे मंसूर साहब वर्तमान समय में चुनाव में धन बल के बढ़ते प्रभाव से व्यथित और हिंदु मुस्लिम के भाईचारे को नष्ट करने वाले नफरत फैलाने वाली राजनीति के कारण लोकतंत्र के भविष्य के प्रति काफी चिंतित हैं। अपने राजनीतिक जीवन में इन्हें हिंदू-मुस्लिम सभी कार्यकर्ताओं का भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ था। विश्वनाथ चौधरी, शालिग्राम यादव, शिव कुमार यादव, विमल चौहान, विमल मालाकार, मंजूर आलम, मिश्र अली, महफिल मास्टर, अशोक यादव, सुबोध यादव, रूपन यादव, अनिल यादव, अनिल सिंह, बजरंगी मंडल, सैफुद्दीन आदि अनेकों कार्यकर्ताओं के द्वारा तन मन धन से किए जाने वाले सहयोग का यह खुद को ऋणी समझते हैं, जिनके सहयोग से राजनीति के ऊंचाई पर पहुंचने में यह सफल हो पाएं। अपने जीवन में आने वाले तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद इन्होंने कभी भी अपने सिद्धांत और विचारधारा से समझौता नहीं किया और कठिन परिस्थितियों में भी राजद परिवार के साथ बने रहे। अपने जीवन के उतार चढ़ाव में इन्हें धर्मपत्नी गुलबहार बीवी का भी भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ। मंसूर साहब के सभी छह पुत्र अब्दुल हनान (मदरसा शिक्षक), अब्दुल मनान (किसान और बालू गिट्टी के व्यापारी), मोहम्मद शमीम अख़्तर (जे. एन. सी. उच्च विद्यालय सेमापुर के प्रधानाध्यापक), डाक्टर तस्लीम अख़्तर (डेंटिस्ट एवं गेड़ाबाड़ी में सरकारी अस्पताल में नियुक्त), डाक्टर शर्फे आलम (एमबीबीएस, बीएसएफ से प्रोन्नति पाकर एनएसजी में नियुक्त) और सबसे छोटा तौकीर आलम (कांग्रेस का राष्ट्रीय युवा सचिव एवं महाराष्ट्र प्रभारी, वर्तमान में कटिहार में जिला परिषद) एवं दो पुत्रियां जेबुन्निसा और शबीना खातून इनके प्रतिष्ठा में चार चांद लगा रहे हैं।

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