19. सच्चिदानंद दास

उत्क्रमित मध्य विद्यालय बारी नगर को मॉडल स्कूल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले प्रधानाध्यापक सच्चिदानन्द दास की एक शिक्षाविद के रूप में बरारी के लोगों के बीच खास पहचान है।
2010 में मानव संसाधन मंत्रालय पटना द्वारा अक्षर अंचल योजनान्तर्गत अक्षर दूत के रूप में महिलाओं के बीच साक्षरता के प्रचार प्रसार के उत्कृष्ट कार्य हेतु श्री दास को सम्मानित किया गया था।
2011 में कटिहार के जिला पदाधिकारी अश्विनी दत्तात्रेय ठकरे के द्वारा गुरुनानक कन्या मध्य विद्यालय में शिक्षक के रूप में उत्कृष्ट सेवा के लिए इन्हें सम्मानित किया गया था।
2006 और 2014 में विद्यालय शिक्षा  समिति के द्वारा भी इन्हें उतकृष्ट सेवा के लिए इन्हें सम्मानित किया गया।
इनका जन्म 1  दिसंबर 1973 को सिवान जिला के धनौती (दरौंदा) में एक अत्यंत साधारण दलित परिवार में हुआ था। इनकी माता का नाम श्रीमती विभा देवी है। इनके पिताजी स्वर्गीय अलगू दास पश्चिम बंगाल में दामोदर वैली कारपोरेशन में एक चतुर्थवर्गीय कर्मि थे। बचपन में श्री दास के पिता जी के एक मित्र ने इनका नाम पुष्पेंद्र रखा था। बंगाल के बांग्ला भाषी लोगों द्वारा पुष्पेंद्र नाम की क्लिष्ट होने के कारण इन्हें बबुआ कह कर बुलाया जाता था। बड़े भाई चंद्रिका राम ने जब विद्यालय में इनका नामांकन करवाया तो बिहार के महान शख्सियत सच्चिदानंद सिन्हा से प्रभावित होकर इनका नाम सच्चिदानंद राम रखा। छठी कक्षा में इनके वर्ग शिक्षक बालेश्वर राम ने फिर एक बार इनका नाम बदलकर सच्चिदानंद दास कर दिया। इनके पैतृक गांव में तथाकथित उच्च जाति के दबंग लोगों का बोलबाला था। दबंग जाति के संपन्न लोगों द्वारा दलित समुदाय के लोगों से काम लेकर मजदूरी नहीं देना, मतदान के समय डराना धमकाना और अन्य प्रकार का शोषण आम बात थी। श्री दास के समुदाय के लोगों की स्थिति इतनी दयनीय थी कि इन्हें तथाकथित दबंग लोगों के सामने खाट पर बैठने की भी इजाजत नहीं होती थी। श्री दास के पिताजी बंगाली संस्कृति से प्रभावित होकर अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति काफी जागरूक थे। श्री दास की प्रारंभिक शिक्षा डीवीसी पब्लिक स्कूल दुर्गापुर (पश्चिम बंगाल) से प्रारंभ हुई। पांचवी के पश्चात पिताजी की आर्थिक और पारिवारिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण इन्हें अपने गांव भेज दिया गया। 1989 में श्री दास ने उच्च विद्यालय हड़सर धनौती (सिवान, बिहार) से द्वितीय श्रेणी से मैट्रिक की परीक्षा पास किया। ये अपने गांव में अपने समुदाय से मैट्रिक पास करने वाले प्रथम छात्र थे। आवागमन की समस्या और आर्थिक परेशानियों के बावजूद श्री दास का पढ़ाई के प्रति लगाव और मैट्रिक में बेहतर परिणाम के बाद परिवार और गांव के लोगों के बीच छोटे उम्र से इन्हें एक होनहार छात्र के रूप में देखा जाने लगा था। इस दौरान हाई स्कूल में गणित के शिक्षक स्वर्गीय शिवजी यादव द्वारा इन्हें काफी प्रोत्साहित किया गया। इंटर की पढ़ाई के लिए इन्होंने डीएवी महाविद्यालय सिवान  में अपना नामांकन करवाया और महाविद्यालय प्रबंधन के द्वारा श्री दास को जिला कल्याण विभाग के छात्रावास में रहने की सुविधा भी आवंटित कर दी गई। यहीं इनकी मित्रता इनके छात्रावास के रूम पार्टनर रामनरेश बैठा (वर्तमान में अंचल कार्यालय में पदस्थापित) से हुई। हॉस्टल सुपरीटेंडेंट जेड. ए. इस्लामिया कॉलेज में हिंदी के प्रकांड विद्वान प्रोफेसर हारून शैलेंद्र के द्वारा इन्हें काफी प्रेरित और प्रोत्साहित किया गया। छात्रावास के माहौल और सीनियर छात्रों के सहयोग और मार्गदर्शन से श्री दास का आत्मविश्वास इतना ऊंचा हो गया था कि इन्हें खुद पर यकीन होने लगा था कि एक दिन सरकारी नौकरी में इनका चयन जरूर होगा। श्री दास के आत्मविश्वास को मजबूत बनाने में तत्कालीन जिला कल्याण पदाधिकारी मथुरा प्रसाद एवं जिला पदाधिकारी शिशिर कुमार सिन्हा की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही। ये  लोग समय-समय पर छात्रावास के बच्चों की समस्याओं से रूबरू होते थे और यथासंभव उनका समाधान कर सभी छात्रों को प्रोत्साहित करते रहते थे। 1991 में आइएससी की परीक्षा दयानन्द एंग्लो वैदिक महाविद्यालय से उत्तीर्ण करने के पश्चात इन्होंने 1991-94 के सत्र में इसी महाविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातक की डिग्री प्राप्त किया।

इसके पश्चात तीन बार लगातार बीपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा में उत्तीर्ण हुए लेकिन मुख्य परीक्षा में श्री दास को सफलता प्राप्त नहीं हुई। दरअसल मुख्य परीक्षा के लिए पटना पहुंचने पर कुछ सीनियर्स छात्रों के  सुझाव पर इन्होंने अर्थशास्त्र विषय में पर्याप्त अध्ययन सामग्री और प्रोफेसर उपलब्ध नहीं होने के कारण इन्होंने मुख्य परीक्षा के लिए अपना विषय बदल कर पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन और लेबर एंड सोशल वेलफेयर रखा था। नये विषय का चयन इनकी असफलता का मुख्य कारण बन गया। इसी बीच 1996 में बीपीएससी के द्वारा शिक्षक नियुक्ति हेतु विज्ञापन जारी किया गया। श्री दास इस परीक्षा में सफल होकर 14 जुलाई 1999 को कटिहार जिला के प्राथमिक विद्यालय दासग्राम भैंसदीरा में सहायक शिक्षक के रूप में नियुक्त हो गये। श्री दास कटिहार आकर बहुत ज्यादा खुश नहीं थे लेकिन इनके क्षेत्र के निवासी श्री अवधेश सिंह के द्वारा शुरुआती दिनों में इनका भरपूर सहयोग किया गया। प्रधानाध्यापक श्री बलराम सिंह इनके आने के पूर्व विद्यालय के इकलौते शिक्षक थे। अतः ग्रामीणों के साथ साथ श्री सिंह के द्वारा भी श्री दास का विद्यालय में गर्मजोशी से स्वागत किया गया। श्री दास विद्यालय के एक कमरे को अपना आवास बनाया और विद्यालय अवधि के बाद भी गांव के बच्चों के बीच शिक्षा दान करने लगे। विद्यालय में स्थापित छोटी सी लाइब्रेरी में 1950 की दशक की मौजूद किताबें इनके मनोरंजन का मुख्य साधन होता था। इसी बीच इनके द्वारा 2005 में  प्राथमिक शिक्षण प्रशिक्षण का डिग्री प्राप्त किया गया।  6 मई 2005 को श्री दास का स्थानांतरण गुरु नानक कन्या मध्य विद्यालय गुरु बाजार में कर दिया गया। 20 जनवरी 2015 को श्री दास को प्रभारी प्रधानाध्यापक के रूप में उत्क्रमित मध्य विद्यालय बारी नगर में पदस्थापित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इनके कुशल नेतृत्व, कठिन परिश्रम और समर्पण के दम पर श्री दास को। 2011 में  प्रखंड का सर्वश्रेष्ठ शिक्षक होने का गौरव प्राप्त हुआ। वर्ष 2015-16 में इनकी विद्यालय को स्वच्छता के मामले में प्रखंड का सर्वश्रेष्ठ विद्यालय घोषित किया गया। वर्ष 2018-19 के सेशन में इनके परिश्रम और समर्पण के कारण उत्क्रमित मध्य विद्यालय बारी नगर प्रखंड का मॉडल विद्यालय के रूप में चुना गया।

2005 में विभाग द्वारा आयोजित  उजाला प्रशिक्षणचर्या के दौरान तत्कालीन प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी श्री चंद्रप्रकाश जी ने इनके कार्यों और शैली की काफी प्रशंसा की थी। समय के पाबंद, अपने कर्तव्यों के प्रति सजग, कठोर प्रशासक रचनात्मक कार्यों में स्वयं को व्यस्त रखने वाले श्री दास ने बरारी के छात्र-छात्राओं की उन्नति हेतु प्रतियोगिता परीक्षा से संबंधित कोचिंग क्लास और कंप्यूटर क्लास का भी संचालन किया। शिक्षा विभाग के पदाधिकारियों के बीच इनकी एक खास पहचान है और यही कारण है कि किसी भी प्रकार के शिक्षकों के प्रशिक्षण संबंधी मास्टर ट्रेनर के रूप में अक्सर इनका चयन किया जाता रहा है। अत्यंत मिलनसार और सभी से दोस्ताना व्यवहार करने वाले श्री दास शिक्षक समुदाय में काफी लोकप्रिय हैं। इनकी धर्मपत्नी श्रीमती ललिता कुमारी भी प्रखंड शिक्षिका हैं और घर के पारिवारिक कार्यों के साथ-साथ विद्यालय के कार्यों में भी कदम से कदम मिलाकर इनका सहयोग करती है। श्री दास को एक पुत्र सुबोध कुमार और दो पुत्री प्रीति कुमारी और नमिता कुमारी के पिता होने का सौभाग्य प्राप्त है। अत्यंत पिछड़े समुदाय से आने वाले श्री दास ने अपने 20 वर्षों के सेवा के दौरान बरारी में ग्रामीणों व  शिक्षक समुदाय के बीच अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई है, और आज यह किसी को एहसास भी नहीं होता है कि श्री दास जन्म से बरारी के निवासी नहीं हैं।

Comments

Popular posts from this blog

22. नियामातुर रहमान

34. चंद्र्किशोर तिवारी उर्फ चुनचुन सर

23. लक्ष्मी नारायण मंडल