20. तौक़ीर आलम
बरारी विधानसभा से तीन बार विधायक रहे, बिहार सरकार के पूर्व मंत्री जनाब मंसूर आलम का सबसे छोटा पुत्र तौकीर आलम राष्ट्रीय फलक पर तेजी से उभरता हुआ युवा कांग्रेसी नेता है। वर्तमान में बरारी मध्य से जिला परिषद के सदस्य एवं यूथ कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव और महाराष्ट्र एवं झारखंड में (कांग्रेस) प्रभारी तौक़ीर साहब बहुत कम उम्र में महिला - पुरुष, बूढ़े - बच्चे, मजदूर - किसान, और खास कर युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हो गये हैं। इनका जन्म 1 जनवरी 1983 को बरारी प्रखंड के कठौतिया गांव में हुआ था। अम्मी बीबी गुलबहार को अपने सबसे छोटे बेटे से इतना लगाव था कि इन्होंने बचपन में तौक़ीर को कभी भी खुद से दूर ही नहीं होने दिया। इसलिए इनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के विद्यालय में ही हुई। 2001 में जामिया मिल्लिया इस्लामिया सेंट्रल यूनिवर्सिटी में अरबिक से स्नातक की पढ़ाई के लिए प्रवेश लिया। एक वर्ष पश्चात ही इन्होंने भारत के अत्यंत प्रतिष्ठित जवाहर लाल नेहरू युनिवर्सिटी देहली की प्रवेश परीक्षा में सफल हो कर स्कूल ऑफ लैंग्वेज लिटरेचर एंड कल्चर स्टडीज विभाग में सेंटर ऑफ अरबिक एंड अफ्रीकन स्टडीज में एडमिशन लेने में सफलता प्राप्त किया। यहां से तौकीर आलम की जिंदगी बिल्कुल ही बदल गई। जे एन यू में लेफ़्ट विचारधारा में विश्वास रखने वाले राजनीतिक दलों के छात्र विंग एस.एफ.अाई. (स्टूडेंट फेडेरेशन ऑफ इंडिया), ए.आई.एस.एफ (आल इंडिया स्टूडेंट फेडेरेशन), ए.आई.एस.ए. (आल इंडिया स्टूडेंट एसोसिएशन) आदि का बोलबाला था। कांग्रेस की शाखा एन.एस.यू.आई. (नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया) और आर.एस.एस. की शाखा एबीवीपी (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) आदि का जे एन यू कैंपस में कोई खास प्रभाव नहीं था। लेफ़्ट विचारधारा के तेजतर्रार छात्र नेताओं मोना दास, शमशाद अहमद, अलविना शकील, संदीप सिंह, नासिर हुसैन, जेएनयू के कांग्रेस छात्र नेताओं से अशोक तंवर, सिम्मी जोजफ, मधुमिता चक्रवर्ती, चन्दन यादव, अलीमल्ला, सागर आज़मी आदि के संपर्क में आने से देश दुनियां के सभी ज्वलंत मुद्दों के प्रति सजग हो कर सोचने समझने और अपनी बातों को मंच पर रखने से ना सिर्फ तौक़ीर साहब का बौद्धिक विकास हुआ बल्कि समाजसेवा और राजनीति के प्रति इनकी दिलचस्पी भी बढ़ने लगी। दरसअल शिक्षा के निजीकरण और बाजारीकरण का विरोध, बेरोजगारी की समस्या का समाधान, आर्थिक खाई को पाटने के उपाय और भेदभाव रहित समाज के निर्माण आदि हमेशा से जे.एन.यू. कैंपस का ज्वलंत मुद्दा रहा है। अपनी दूरदर्शी सोच के कारण इन्हें लेफ़्ट विचारधारा की अपेक्षा एन.एस.यू.आई. (कांग्रेस का छात्र विंग) की विचारधारा ज्यादा व्यवहारिक और भारतीय संदर्भ में अन्य से बेहतर प्रतीत हुआ। इसलिए इन्होंने जे.एन.यू. के प्रेमचंद, चंदन यादव, मधुमिता चक्रवर्ती, अशोक तंवर और एनएसयूआई के नदीम जावेद आदि साथियों के सहयोग से लेफ़्ट के गढ़ जे.एन.यू. कैंपस में कांग्रेस की विचारधारा का प्रचार प्रसार करना प्रारंभ कर दिया। 2004 में इन्होंने एन.एस.यू.आई. से जे.एन.यू. छात्र संघ चुनाव में काउन्सलर उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ा और एन.एस.यू.आई. के पैनल में पहले के सभी उम्मीदवारों की अपेक्षा सबसे ज्यादा वोट प्राप्त कर चुनाव हारने के बावजूद जे.एन.यू. कैंपस में एन.एस.यू.आई. का डंका पीटने में सफल रहे। 2005 में इन्होंने पुनः काउंसलर पद पर भाग्य आजमाया लेकिन महज पांच वोट से सफलता प्राप्त करने से महरूम रह गये। इसके बावजूद इनका आत्मविश्वास इतना मजबूत हुआ कि 2005 से 2008 के बीच इन्होंने जे.एन.यू. कैंपस में छात्र संघ चुनाव में सचिव और अध्यक्ष पद पर लेफ्ट के गढ़ में एन.एस.यू.आई. उम्मीदवार के रूप में मजबूती से चुनाव लड़ा और हार के बावजूद महत्त्वपूर्ण अनुभव हासिल किया, इसी बीच एन.एस.यू.आई. जे.एन.यू. में पार्टी के इंटरनल चुनाव में महासचिव चुने गए और पार्टी के जेएनयू यूनिट के उपाध्क्ष भी रहे।
छात्र राजनीति के साथ साथ इन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी। 2004 में डिप्लोमा इन मीडिया एंड कम्युनिकेशन की डिग्री प्राप्त किया। 2004-06 में स्नातकोत्तर की उपाधि प्राप्त किया। 2007-08 में 1950 से हिंदुस्तान और अरब देशों के सांस्कृतिक संबंध विषय से इन्होंने एम. फिल. की डिग्री भी हासिल किया। 2009 में इन्होंने पी.एच.डी. की डिग्री के लिए जे.एन.यू. में अपना रजिस्ट्रेशन करवाया जिसमें इनके शोध का विषय है - मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के धार्मिक और राजनीतिक मूल्य। 2009-11 के बीच इन्हें इंद्रा गांधी नेशनल ओपन यूनवर्सिटी (इग्नू) से एक शोधार्थी और व्याख्याता के रूप में जुड़ने का अवसर प्राप्त हुआ और इन्होंने दूरस्थ शिक्षा माध्यम से अंग्रेजी से अरबी कैसे सीखें कोर्स को भी डेवलप किया है। समाजसेवा और अपने क्षेत्र के लोगों की समस्याओं के समाधान हेतु कुछ कर गुजरने की महत्वाकांक्षा के कारण सक्रिय राजनीतिक भूमिका में आने की इनकी हार्दिक इच्छा थी। 2004-09 में जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी तो अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के लिए राज्य सरकार द्वारा भूमि मुहैया नहीं हो पाने के कारण इसे कटिहार से किशनगंज स्थानांतरित कर दिया गया। इनसे तौकीर आलम को काफी ठेस पहुंचा लेकिन जब किशनगंज में भी विश्वविद्यालय निर्माण कार्य बाधित होने लगा तो किशनगंज के तात्कालीन सांसद मौलाना असरारुल हक कासिमी के नेतृत्व में संचालित ए. एम. यू. कोर्डिनेशन कमेटी (सीमांचल) का इनके द्वारा भरपूर सहयोग किया गया। इसके बाद 2010 में असलम मल्लिक की अध्यक्षता में ह्यूमन चैन नामक एनजीओ का गठन हुआ, जिसमें तौकीर साहब को सचिव बनाया गया। तौकीर साहब के मार्गदर्शन में ह्यूमन चैन एक प्रेशर ग्रुप के रूप में ए एम यू किशनगंज के निर्माण हेतु कानून मंत्री सलमान खुर्शीद, केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान, उप कुलपति लेफ्टिनेंट जमीरुद्दीन साह आदि से विश्वविद्यालय की यथा शीघ्र निर्माण की गुहार लगाई। जिसके फलस्वरूप ए एम यू किशनगंज के निर्माण कार्य को हरी झंडी मिल पाई और तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी के द्वारा इसका आधारशिला रखा गया। 2012 में यूथ कांग्रेस के आंतरिक सांगठनिक चुनाव में तौकीर आलम को कटिहार जिला के लिए लोकसभा अध्यक्ष के रूप में चयनित किया गया। 2014 में इनकी देखरेख में सीमांचल के युवाओं के लिए कांग्रेस की विचारधारा के प्रचार-प्रसार हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्य में प्रदेश अध्यक्ष कुमार आशीष ने भी इनका भरपूर सहयोग किया। इसके बाद युवा कांग्रेस के द्वारा संचालित आपके द्वार कार्यक्रम के प्रचार प्रसार में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
तौकीर साहब गांधी के आदर्शों और विचारों का काफी सम्मान करते हैं। यही कारण है कि जब 2013 में कुर्सेला में तत्कालीन सांसद तारिक अनवर के द्वारा गांधी शौचालय का उद्घाटन किया गया तो उन्होंने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उन्हें शौचालय के नामांकन में गांधी नाम के उपयोग से घोर आपत्ति थी। 2014 में एनसीपी से गठबंधन उम्मीदवार तारिक अनवर के चुनाव प्रचार अभियान में भी इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही और तारिक साहब को इस चुनाव में जीत भी हासिल हुई। तौकीर साहब की कर्मठता और सक्रियता का पुरस्कार पार्टी ने उन्हें 2015 के विधानसभा चुनाव में प्राणपुर विधानसभा क्षेत्र से अपना उम्मीदवार बना कर दिया। तौकीर साहब के चुनाव प्रचार हेतु सालमारी में कांग्रेस के कद्दावर नेता राहुल गांधी ने भी एक बड़ा जनसभा किया था हालांकि महज कुछ वोटों से इन्हें चुनाव में पराजय झेलना पड़ा। 2016 में इन्होंने बरारी मध्य से जिला परिषद का चुनाव लड़कर सफलता प्राप्त की और चेयरमैन का पद अति पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित होने के कारण इन्हें अपना किस्मत आजमाने का मौका मिला, लेकिन एक बार फिर बहुत कम अंतर सिर्फ एक वोट से यह चेयरमैन का चुनाव हार गए। अपने छोटे से राजनीतिक कैरियर में तौक़ीर साहब को यूथ कांग्रेस का राष्ट्रीय सचिव, बंगाल चुनाव प्रभारी, हरियाणा चुनाव प्रभारी, सिक्किम चुनाव प्रभारी, अरुणाचल चुनाव प्रभारी, महाराष्ट्र चुनाव प्रभारी, झारखंड चुनाव प्रभारी, गुजरात चुनाव प्रभारी, पंजाब चुनाव प्रभारी, उत्तर प्रदेश चुनाव प्रभारी आदि बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। इस दौरान इन्हें कांग्रेस के वरिष्ठ नेत्री एवं अध्यक्ष सोनिया गांधी, पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी, वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद, ऑस्कर फर्नांडीस, अशोक तवर, किशोरी लाल शर्मा, धर्मेंद्र सिंह, राजा बराड़, सलमान खुर्शीद, अशोक गहलोत, केशवचंद्र यादव, कृष्णा अलुवारू, प्रेमचंद्र मिश्रा, शकील अहमद, कुमार आशीष, मदन मोहन झा, बिहार के पूर्व शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी आदि का भरपूर सहयोग प्राप्त हुआ है। अपने राजनीतिक एवं सामाजिक क्रियाकलापों और गतिविधियों में इन्हें अपनी बेगम शहनाज परवीन का भी भरपूर सहयोग प्राप्त होता है। इनकी बेगम शहनाज परवीन खुद भी यूथ कांग्रेस कटिहार के महासचिव पद पर आसीन हैं।इन्हें अपने सभी भाइयों एवं परिवार के सदस्यों का सहयोग प्राप्त होता रहता है लेकिन इनके बड़े भाई अशरफ ए आलम इनका विशेष रुप से हौसला अफजाई करते रहते हैं। अपनी तमाम व्यस्तताओं के बीच अपने इकलौते पुत्र फहद आलम के साथ समय गुजारना इन्हें बहुत अच्छा लगता है। जीवन की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए तौकीर साहब कालिकापुर से सेमापुर के रास्ते में स्थित आलम फ्यूल सेंटर (किसान सेवा केंद्र) नामक पेट्रोल पंप का संचालन करते हैं।
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