21. संयोगिता सिंह

बिहार प्रदेश महिला कांग्रेस की पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष, रायबहादुर रघुवंश प्रसाद सिंह की पौत्र वधु संयोगिता सिंह समाजसेवा के कार्य में जमीनी स्तर पर लोगों के साथ जुड़कर कार्य करने वाली, गरीबों, पिछड़ों, दलितों की हमदर्द, महिलाओं के बीच खासा लोकप्रिय, राजनीतिक गलियारों में एक सुशिक्षित, कर्मठ, सुशील, प्रखर वक्ता, एवं भारतीय संस्कारों से सुसज्जित एक सशक्त नेत्री के रूप में बरारी विधानसभा में अपनी विशिष्ट पहचान रखती हैं।इनका जन्म 22 मई 1967 को उत्तर प्रदेश के गोंडा जिला के बलरामपुर विधानसभा क्षेत्र के छः बार विधायक रह चुके स्वर्गीय मान बहादुर सिंह के यहां हुआ था।इनकी माता का नाम स्वर्गीय उषा सिंह है। इनकी माताजी बलरामपुर डिग्री कॉलेज की अवैतनिक प्रोफ़ेसर थी। अपने आठ बहनों में सबसे बड़ी श्रीमती संयोगिता बचपन से एक मेधावी छात्रा थी। इनकी प्रारंभिक शिक्षा लोरेटो कॉन्वेंट लखनऊ में हुई। 1982 में इन्होंने यहां से आईसीएससी बोर्ड से मैट्रिक की परीक्षा पास किया। 1984 में इन्होंने लोरेटो कॉन्वेंट लखनऊ से ही आर्ट्स विषय के साथ इंटर की डिग्री  प्राप्त किया। 1986 में अवध गर्ल्स डिग्री कॉलेज से इन्होंने अंग्रेजी भाषा से स्नातक की डिग्री प्राप्त किया। श्रीमती संयोगिता अपने कॉलेज लाइफ से काफी सोशल थी और अपने सहपाठियों की समस्याओं के समाधान हेतु प्रयासरत रहती थी। यही कारण है कि 1986-87 में इन्हें अपने दोस्तों पल्लवी अग्रवाल (कमिश्नर, इनकम टैक्स) एवं शिवा अस्करे (कनाडा में भारतीय दूतावास में कार्यरत) आदि के दबाव में अवध गर्ल्स डिग्री कॉलेज के अध्यक्ष का चुनाव लड़ना पड़ा और श्रीमती संयोगिता को अपने विश्वविद्यालय का अध्यक्ष बनने का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ। विश्वविद्यालय की छात्र-छात्राएं इनसे इतना प्रभावित थे कि इन्हें चुनाव जीतने के लिए कोई खास प्रचार-प्रसार नहीं करना पड़ा। अपने चुनाव प्रचार के दौरान यह विश्वविद्यालय के छात्र छात्राओं से सिर्फ इतना ही कहती थी कि जो सबसे अच्छा है उन्हें चुने। अध्यक्ष रहते हुए श्रीमती संयोगिता ने कॉलेज फेस्टिवल के दौरान नजराना- ए- अवध कार्यक्रम का राष्ट्रीय स्तर पर आयोजन किया, जिसमें संपूर्ण भारत के सभी महत्वपूर्ण कॉलेजों के छात्र-छात्राओं ने भाग लिया।श्रीमती संयोगिता बचपन से आईएएस बनना चाहती थी और उन्होंने अपने पहले ही प्रयास में 1990 में पीटी की परीक्षा भी पास कर लिया था लेकिन अपरिहार्य कारणों से मुख्य परीक्षा में भाग नहीं ले पाई। 1990 में लखनऊ विश्वविद्यालय से इन्होंने अंग्रेजी भाषा में स्नातकोत्तर की डिग्री भी प्राप्त किया। इसी वर्ष बारह दिसंबर 1990 को इनका विवाह कुर्सेला स्टेट के स्वामी स्वर्गीय रायबहादुर रघुवंश प्रसाद सिंह के मंझले पुत्र अखिलेश कुमार सिंह के सबसे छोटे पुत्र पंकज सिंह से हो गया।

विवाह के लगभग 11 वर्षों बाद इनके जीवन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण मोड़ तब आया, जब इनके पति पंकज सिंह के बड़े भाई अमरेश सिंह की धर्मपत्नी आभा सिंह ने 2001 में  त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव के दौरान जिला परिषद सदस्य के लिए नामांकन करवाया। कुर्सेला स्टेट परिवार के अधिकांश लोग श्रीमती आभा सिंह के इस निर्णय से बहुत ज्यादा खुश नहीं थे और इसे अपने परिवार के सम्मान के खिलाफ समझते थे। श्रीमती आभा को नामांकन वापस लेने के लिए मनाने हेतु परिवार के सदस्यों ने दबाव बनाने की मंशा से श्रीमती संयोगिता का भी इसी पद के लिए नामांकन करवा दिया। परिवार के शुभचिंतक कृष्णानंद चौधरी ने मध्यस्था करवाने का काफी प्रयास किया लेकिन वह असफल रहे। अंततः श्रीमती आभा (चम्मच छाप) और श्रीमती संयोगिता (टाफी छाप) दोनों ने अपना भाग्य आजमाया और श्रीमती संयोगिता भारी मतों से यह चुनाव जीतने में सफल रही। इस प्रकार श्रीमती संयोगिता का संयोगवश चुनावी राजनीति में प्रवेश हो जाता है। उस समय तापमान पत्रिका के वरिष्ठ पत्रकार राजरतन कमल के शब्दों में धूम्रकेतु की तरह श्रीमती संयोगिता राजनीतिक पलक पर उभर कर सामने आती है। इस जीत से उत्साहित श्रीमती संयोगिता ने अपने पति और परिवार जनों के समर्थन से चेयर मैन का भी चुनाव लड़ा लेकिन टॉस के माध्यम से हुए निर्णय में इन्हें सफलता प्राप्त नहीं हुई। इशरत प्रवीण के पति ज़ाकिर हुसैन को चेयर मैन बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

2004 में इन्होंने जिला परिषद सदस्य के तौर पर तत्कालीन केंद्रीय मंत्री एवं लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक माननीय रामविलास पासवान से दिल्ली में मुलाकात किया और लोजपा की प्राथमिक सदस्यता भी ग्रहण किया। श्री पासवान इनसे इतना प्रभावित हुए कि इन्हें लोजपा का महासचिव भी बनाया गया और फरवरी 2005 में बरारी विधानसभा क्षेत्र से इन्हें अपना उम्मीदवार भी बनाया। श्रीमती संयोगिता इस चुनाव में लगभग 14500 वोट प्राप्त कर तीसरे स्थान पर रही लेकिन इनके समर्थकों के अनुसार अगर झोपड़ी छाप से मिलता जुलता चुनाव चिह्न से चुनाव लड़ रहे निर्दलीय उम्मीदवार शिवपूजन पासवान  (लिफाफा छाप) को इनके असाक्षर और बुजुर्ग समर्थकों द्वारा गलती से हज़ारों मत नहीं दिया गया होता तो शायद चुनाव परिणाम कुछ और होता।

महज छह माह बाद नवंबर 2005 में हुए चुनाव में जब श्रीमती संयोगिता लगभग 18000 से ज्यादा वोट लाने में सफल होती है तो इनके समर्थकों का बात बुद्धिजीवियों को भी सही प्रतीत होने लगता है लेकिन दुर्भाग्यवश बदले चुनावी समीकरण के कारण श्रीमती संयोगिता को एक बार फिर से तीसरे स्थान से ही संतोष करना पड़ता है। अपने चुनाव प्रचार के दौरान गरीबों और दलितों के बीच मोटा चावल खाना, सत्तू और साग उनके बीच उनके साथ बैठकर खाना और सभी जाति धर्म के लोगों के साथ इनके आत्मीय व्यवहार ने इनके विरुद्ध इनके विरोधियों द्वारा किये गए सभी दुष्प्रचार को गलत साबित कर दिया।

श्रीमती संयोगिता के शुभचिंतक इनके उज्ज्वल भविष्य के लिए लगातार इन्हें किसी राष्ट्रीय पार्टी से जुड़ने का सलाह देते रहते थे। इसी कारण इन्होंने 2009 में सेक्यूलर छवि रखने वाले देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को ज्वाइन कर लिया और इनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर महज दो माह बाद इन्हें बिहार प्रदेश कांग्रेस  कमेटी का सचिव नियुक्त किया गया। इसके अलावा इन्हें बनमनखी, कस्बा सहित तीन विधानसभा क्षेत्रों का चुनाव प्रभारी भी बनाया गया। 2010 में संपूर्ण बिहार में सुशासन बाबू के रूप में अपनी खास छवि बनाने वाले माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की  लहर थी।  कांग्रेस ने इन्हें बरारी विधानसभा क्षेत्र से अपना प्रत्याशी बनाया लेकिन मतदान के चार दिन पूर्व ही इनके पिताजी का निधन हो जाने के कारण इन्हें अपना चुनाव प्रचार छोड़कर लखनऊ जाना पड़ा। इसके बावजूद श्रीमती संयोगिता को इस चुनाव में 11000 वोट प्राप्त हुआ, जबकि अधिकांश उम्मीदवारों की जमानत भी जप्त हो गई थी। 2016 में अचानक इनके पति पंकज सिंह की किडनी में समस्या आ गई और इन्हें अपना एक किडनी अपने पति को दान करना पड़ा। अपने पति के किडनी ट्रांसप्लांटेशन के कारण इन्हें कुछ वर्षों तक सक्रिय राजनीति और समाज सेवा से दूर रहना पड़ा लेकिन 2017 में इनके शुभचिंतकों और चाहने वालों ने इन्हें पुनः सक्रिय राजनीति में वापसी करने के लिए विवश कर दिया। पार्टी के शीर्ष नेताओं के निर्देश पर इन्होंने इस बार पूर्णिया जिला के रुपौली विधानसभा को अपना कर्म भूमि बनाने का निर्णय लिया है। अपने दरवाजे पर मदद के लिए आने वाले लोगों के सहयोग के लिए समर्पित श्रीमती संयोगिता और उनके पति समय-समय पर लाल पैथोलॉजी का निशुल्क जांच शिविर का आयोजन करते रहते हैं। सिंह दंपति द्वारा निर्मित विवाह भवन सुमित्रा स्मृति भवन में भी गरीब परिवार के लड़कियों की शादी विवाह के दौरान काफी रियायत दी जाती है। इनकी निजी कोष से सर्वोदय महाविद्यालय कुर्सेला में कई निर्माण कार्य भी करवाया गया है। दुर्गा मंदिर कुर्सेला में भी इनके द्वारा शौचालय और स्नानागार की व्यवस्था की गई है।

अपने पिता और पति को अपना राजनीतिक गुरु मानने वाली श्रीमती संयोगिता पूर्व प्रधानमंत्री एवं आयरन लेडी श्रीमती इंदिरा गांधी को अपना प्रेरणा मानती है। अपने राजनीतिक जीवन में इन्हें रामविलास पासवान, पशुपति कुमार पारस, चिराग पासवान, राहुल गांधी, सचिन पायलट, दिग्विजय सिंह, मोहम्मद अजहरुद्दीन, सुष्मिता देव, राज बब्बर, मदन मोहन झा आदि कई कद्दावर नेताओं का सहयोग और मार्गदर्शन प्राप्त होता रहता है। श्रीमती संयोगिता अपनी तमाम व्यस्तताओं के बावजूद अपनी सुपुत्री शांभवी सिंह (मणिपाल में एमबीबीएस की पढ़ाई में अध्ययनरत) एवं पुत्र अद्वैत सिंह (दिल्ली के गुड़गांव में अमेरिकन मल्टीनेशनल कंपनी हैरिस इंटरनेशनल में फाइनेंस कंसलटेंट) का भी एक मां के रूप में पूरा ख्याल रखने का प्रयास करती है। इनके पुत्र ने लंदन से इकोनॉमिक्स में स्नातक की डिग्री भी प्राप्त किया है।

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