15. श्री जयनारायण चौधरी

अब और संस्कत व्याकरण पर पूर्ण अधिकार रखने वाले, सत्तर के दशक के विज्ञान स्नातक,विद्या दान को मानवधर्म और मानवता की सच्ची सेवा मानने वाले जे. एन. सी. उच्च विद्यालय सेमापुर के सेवानिवृत्त शिक्षक जय नारायण चौधरी एक उत्कृष्ट शिक्षाविद् के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। डाक्टर राजीव रंजन (हार्ट स्पेशलिस्ट कटिहार), डाक्टर रज्जाक (मेडिकल कॉलेज कटिहार), बी. के. सिंह (ऑडिटर, एसबीआई), इमरान मल्लिक (अाई. जी. छत्तीसगढ़), रतन कुमार चौधरी (प्रबंधक एसबीआई), संजय चौधरी (इलेक्ट्रॉनिक इंजीनियर) आदि जैसे सैकड़ों सफल शागिर्द आज देश के कोने कोने में इनका नाम रौशन कर रहे हैं। अपने ज़माने के कड़क शिक्षक एवं जे. एन. सी. उच्च विद्यालय के सबसे सफल प्रधानाध्यापक राजेन्द्र प्रसाद चौधरी के सहयोगी रहे श्री चौधरी का जन्म 1 फ़रवरी 1942 को थानाबिहपुर के भूमिहार ब्राह्मण बहुल धनाढ्य बस्ती जयरामपुर में एक संपन्न परिवार में हुआ था। इनकी माता स्वर्गीय सिया देवी एक शिक्षिका और विद्वान महिला थी। इनके पिताजी स्वर्गीय चामा लाल चौधरी उर्फ़ शर्मा जी एक क्रांतिकारी व्यक्ति थे। अगस्त क्रांति नामक किताब में फरार चामा लाल शर्मा नाम से इनके माताजी की तस्वीर प्रकाशित हुई है। अंग्रेज़ो द्वारा गिरफ़्तारी के डर से इनके पिताजी अक्सर घर से फरार रहते थे। एक बार जब अंग्रेज इन्हें पकड़ने घर आये तो इन्हें नहीं पाकर आग बबूला हो गये। फ़िर अंग्रजों ने इनके दुधमुंहे छोटे भाई को ही मां की गोद से छीनकर जेल लेकर चले गए। मां ने भी खुशी खुशी यह कह कर बच्चा दे दिया कि जब देश के लिए सिंदूर कुर्बान कर सकती हूं तो कोख़ क्या बड़ी चीज है। हालांकि जेलर ने दुधमुंहे बच्चे की गिरफ्तारी जेल मैनुअल के विरुद्ध होने की बात कह कर अफसरों को बच्चा वापस लौटाने के लिए बाध्य कर दिया। श्री चौधरी अपने आठ भाई और दो बहनों में दूसरे नंबर पर आते हैं। इनकी प्रारंभिक शिक्षा बुनियादी विद्यालय जयरामपुर में हुई। हाई स्कूल की पढ़ाई के लिए इन्हें अपने गांव से ग्यारह किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। 1959 में इन्होंने उच्च विद्यालय नारायणपुर से मैट्रिक की परीक्षा पास किया। 1962 में जेपी कॉलेज नारायणपुर से इन्होंने साइंस विषय से इंटर की परीक्षा पास किया। 1965 में टीएनबी कॉलेज भागलपुर से बीएससी की परीक्षा भी इन्होंने पास किया। अपने विद्यार्थी जीवन में इन्हें अपने हिन्दी शिक्षक त्रिशूलधारी चौधरी एवं संस्कृत के शिक्षक पंडित धर्मिधर झा का विशेष स्नेह प्राप्त था।

उस समय शिक्षकों का वेतन बहुत कम होने के कारण इनके बड़े भाई जयप्रकाश चौधरी शिक्षक की नौकरी छोड़कर चंपारण से वापस घर आ गये। घर में छोटे भाई बहनों एवं बहन के बच्चों की पढ़ाई बाधित होने से श्री चौधरी ने कमाई की नियमित व्यवस्था के मद्देनजर घर छोड़ने का फैसला लिया। 1966 में इन्हें अपने पिताजी के विधायक मित्र की अनुशंसा पर टाटानगर के लेडी इंद्र सिंह रामकृष्ण मिशन हाई स्कूल में 115 रुपया की पगार पर शिक्षक की पहली नौकरी प्राप्त हुई। इसी दौरान इन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय से 1968 में B.Ed की डिग्री भी प्राप्त किया। आगे चल कर 1977 में भागलपुर विश्वविद्यालय से ही इन्होंने हिंदी में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त किया। 1970 में जी.एन.सी उच्च विद्यालय सेमापुर के प्रबंधन समिति द्वारा प्रधानाध्यापक राजेंद्र प्रसाद चौधरी के नेतृत्व में शिक्षकों की नियुक्ति हेतु साक्षात्कार का आयोजन किया गया। इस साक्षात्कार में श्री चौधरी ने भी हिस्सा लिया। उनकी विद्वता, प्रभावशाली अभिव्यक्ति और व्यवहार कुशलता से प्रभावित होकर प्रबंधन समिति ने इन्हें विद्यालय का शिक्षक नियुक्त कर दिया। इसके बाद इन्होंने इस विद्यालय को ही अपना कर्मभूमि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ा। हालांकि कुछ समय के लिए इनका अन्य विद्यालय में भी स्थानांतरण हुआ। फ़रवरी 1995 से जुलाई 1998 के बीच उच्च विद्यालय भोगा - भटकामा और जुलाई 1998 से जून 2003 तक श्री सत्यनारायण उच्च विद्यालय गोवागाछी और अंत में पुनः जेएनसी उच्च विद्यालय सेमापुर में इनका स्थानांतरण हुआ, लेकिन 31 जनवरी 2004 को सेवानिवृत्ति के बाद इस विद्यालय और सेमापुर से इनका इतना लगाव बढ़ गया कि इन्होंने अपना पैतृक गांव छोड़कर इसी विद्यालय के सामने अपना आवास बनाकर अपने जीवन का शेष समय यहीं गुजार रहे हैं।

अपने संपूर्ण जीवन काल में इन्होंने अपने संपर्क में आए छात्रों के सर्वांगीण विकास के लिए स्वयं को समर्पित कर दिया। रात्रि के दो बजे उठकर दैनिक नित्य कर्म और पूजा पाठ से निवृत्त होते ही सुबह चार बजे से बच्चों को पढ़ाना प्रारंभ कर देते थे। उस समय बिजली की व्यवस्था नहीं होती थी। पेट्रोमैक्स और लालटेन की रोशनी में बच्चों को अपना पढ़ाई करना होता था। छात्रावास के सभी बच्चों से आत्मीय संबंध बनाकर उनकी समस्याओं का यथोचित समाधान करना और बच्चों के अंदर की मेधा को सही दिशा प्रदान करने के लिए श्री चौधरी दिन रात प्रयत्नशील रहते थे। विद्यालय में भी आठ घंटी तक लगातार बच्चों को पढ़ाने में इन्हें विशेष आनंद प्राप्त होता था। संध्या समय में भी छात्रावास के बच्चों को पढ़ा कर वह रात्रि के दस बजे ही विश्राम के लिए बिछावन पर जा पाते थे। अपने संपूर्ण जीवन काल में इन्होंने कभी भी अतिरिक्त आय के लिए पैसे लेकर बच्चों को ट्यूशन नहीं पढ़ाया। इनके पढ़ाने की शैली बच्चों को इतनी रुचिकर लगती थी कि सेमापुर ओपी के दरोगा का पुत्र इमरान मल्लिक ने उर्दू छोड़कर संस्कृत विषय पढ़ना प्रारंभ कर दिया। संस्कृत विषय में अपनी अच्छी पकड़ के कारण ही आज इमरान मल्लिक छत्तीसगढ़ में आई. जी. के पद पर आसीन हैं।

सेवानवृत्ति के पश्चात यह अपनी धर्मपत्नी श्रीमती प्रेमा चौधरी के साथ ईश्वर की आराधना में तल्लीन हो कर अपना शेष समय व्यतीत कर रहे हैं। रामाश्रय सत्संग मथुरा के आध्यात्मिक धर्मगुरु डॉ चतुर्भुज सहाय को अपना गुरू मानकर बुढ़ापे में उनकी सेवा में समर्पित रहते हैं। वर्तमान समय में शिक्षा के प्रति बच्चों और शिक्षकों के गैर जिम्मेदाराना रवैया से श्री चौधरी बिल्कुल क्षुब्ध हैं। अच्छे शिक्षक के लिए विद्वता से ज्यादा मानवीय गुणों और सीखने सिखाने की प्रवृत्ति का होना श्री चौधरी ज्यादा जरूरी समझते  हैं लेकिन आज शिक्षक सिर्फ अपने आर्थिक तरक्की की चिंता तक सीमित हो गये हैं। धनाढ्य परिवार के लोगों द्वारा अपने बच्चों को महंगे निजी विद्यालय में पढ़ाया जा रहा है जहां उन्हें अच्छा संस्कार छोड़कर सबकुछ मिल रहा है। गरीब बच्चों और सरकारी स्कूलों की दयनीय स्थिति से भी श्री चौधरी काफी निराश हैं।

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