17. राजेंद्र नारायण चौधरी

पूर्व मुख्यमंत्री जगरनाथ मिश्रा के रूम पार्टनर एवं डीएस कॉलेज कटिहार के अर्थशास्त्र विभाग से सेवानिवृत्त यूनिवर्सिटी प्रोफेसर राजेंद्र नारायण चौधरी एक शिक्षाविद के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान रखते हैं। पूर्व मंत्री जनाब मंसूर आलम, पूर्व विधायक विभाष चंद्र चौधरी, पूर्व विधायक मोहम्मद शकुर,राजद के वरिष्ठ नेता और रौनिया के मुखियाजी शालिग्राम यादव आदि नामचीन हस्तियों के प्रोफेसर रहे श्री चौधरी ने अपने कठिन मेहनत, लग्न और अर्थशास्त्र के ज्ञान की बदौलत उच्च शिक्षा में अपनी खास पहचान बनाने में सफल रहे। इनका जन्म 26 जुलाई 1937 को बरेटा स्टेट झक्सु नारायण चौधरी के पौत्र के रूप में अत्यंत संपन्न परिवार में हुआ था। इनकी माता का नाम स्वर्गीय जानकी देवी है। इनके पिताजी का नाम स्वर्गीय सूर्य नारायण चौधरी है। इस समय देश को आजादी नहीं मिली थी। कटिहार जिला स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में भी नहीं आया था। कटिहार, पूर्णिया जिला के अंतर्गत ही आता था। इनके पिताजी कांग्रेस कमेटी के सक्रिय सदस्य एवं पूर्णिया जिला के उपाध्यक्ष थे। आजादी के पश्चात इनके पिताजी कांग्रेस कमेटी बरारी के आजीवन अध्यक्ष रहे। इनके पिताजी को वर्तमान प्रखंड प्रमुख के समतुल्य ब्लॉक डेवलपमेंट कमिटी का चेयरमैन बनने का भी सौभाग्य प्राप्त था। बरेटा पंचायत के अस्तित्व में आने के पश्चात इनके पिताजी निर्विरोध मुखिया भी चुने गए थे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा 1914 में स्थापित प्राथमिक विद्यालय बरेटा से हुई। इसी प्राथमिक विद्यालय में पढ़े स्वर्गीय तारिणी प्रसाद यादव आगे चलकर डी. एस. कॉलेज में फिजिक्स विभाग के प्रोफेसर हुए। 1955 में श्री चौधरी ने महेश्वरी अकैडमी कटिहार से मैट्रिक की परीक्षा पास किया। 1955-57 तेज नारायण जुबली कॉलेज भागलपुर (वर्तमान में टी. एन. बी. कॉलेज भागलपुर) से इन्होंने आर्ट्स विषय से इंटर की परीक्षा पास किया। दरसअल इस कॉलेज के अधिकांश भवन गरबनैली स्टेट का होने के कारण प्रिवी कॉन्सिल लंदन के निर्णय के अनुसार बाद में इस कॉलेज का नाम टीएनबी कॉलेज भागलपुर हो गया। इसी दौरान उनकी मित्रता पूर्व मुख्यमंत्री जगरनाथ मिश्रा से हुई। यह उनके रूम पार्टनर भी थे और आगे चलकर इनकी यह मित्रता और भी गहरी होती चली गई। 1957-59 में भागलपुर के प्रसिद्ध टी एन जे कॉलेज से इन्होंने अर्थशास्त्र से स्नातक की डिग्री प्राप्त किया। 1959-61 में लंगट सिंह कॉलेज मुजफ्फरपुर से इन्होंने स्नातकोत्तर की डिग्री अर्थशास्त्र से प्राप्त किया। 1959-61 में ही इन्होंने एस. के. ला कॉलेज में एलएलबी में प्रवेश लिया लेकिन फाइनल परीक्षा नहीं दे पाए। श्री चौधरी इतने मेधावी छात्र थे कि इन्हें कक्षा पांचवीं से स्नातकोत्तर की पढ़ाई के लिए छात्रवृति मिलती थी लेकिन इन्होंने इस छात्रवृत्ति का उपयोग कभी भी स्वयं की जरूरत पुरा करने के लिए नहीं किया। इनके साथ प्राणपुर निवासी आर एन मंडल एक बहुत ही करीबी गरीब मित्र थे। छात्र जीवन में मिली छात्रवृत्ति की राशि का उपयोग यह अपने इसी गरीब मित्र की पढ़ाई की जरूरतों को पूरा करने के लिए करते थे। आगे चलकर इनका यह मित्र भी अर्थशास्त्र में प्रोफेसर बना।


स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात इन्होंने राजेंद्र कॉलेज छपरा में नौकरी के लिए अपना बायोडाटा भेजा। इस कॉलेज के प्रिंसिपल और रसायन विभाग के अध्यक्ष डॉ भोला प्रसाद सिंह इनकी डिग्रियों और बायोडाटा से इतना प्रभावित हुए कि बिना किसी साक्षात्कार के इन्हें कॉलेज में प्रोफेसर के रूप में नौकरी प्राप्त हो गई। सिर्फ 6 माह के बाद ही इन्होंने जेपी कॉलेज नारायणपुर में आवेदन किया और 2 जनवरी 1962 को रीडर के रूप में इनकी नियुक्ति हो गई। आगे चलकर श्री चौधरी इस कॉलेज में अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष भी बने। 4 फरवरी 1982 को अपने कॉलेज के मित्र और तत्कालीन मुख्यमंत्री जगरनाथ मिश्रा की अनुशंसा पर विश्वविद्यालय के कुलाधिपति  के द्वारा इनका तबादला डी एस कॉलेज कटिहार में कर दिया गया। कॉलेज के छात्र छात्राओं से काफी घनिष्ठता और लगाव होने के कारण यह चुपचाप वहां से प्रस्थान कर गए और कोई भी विदाई समारोह लेने का इनका साहस नहीं हुआ। 5 फरवरी 1982 को इन्होंने डी एस कॉलेज को ज्वाइन किया। 31 दिसंबर 1977 को इसी कॉलेज से यूनिवर्सिटी प्रोफेसर के रूप में श्री चौधरी रिटायर हुए। 1994 में डी एस कॉलेज के अर्थशास्त्र के स्नातकोत्तर के पाठ्यक्रम में इकोनॉमिक्स डॉक्ट्रिन और थ्योरी ऑफ इकोनॉमिक का समावेश किया गया। अर्थशास्त्र विभाग के कोई भी प्रोफ़ेसर इसे पढ़ाने को तैयार नहीं थे। ऐसे में डी एस कॉलेज के अर्थशास्त्र स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम पर संकट के बादल मंडराने लगे। ऐसे में श्री चौधरी ने तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ राम लखन राम के आग्रह पर गहन अध्ययन कर इस पाठ्यक्रम को कॉलेज में पढ़ाया और अर्थशास्त्र के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम को डीएस कॉलेज में बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। अपने सेवा काल के दौरान श्री चौधरी को 1984, 1985 और 1987 में बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन के सदस्य के रूप में पद ग्रहण करने का तीन बार आॅफ़र आया लेकिन होम सिकनेस के कारण इन्होंने यह ऑफर ठुकरा दिया। इतना ही नहीं 1967 में टी एन बी कॉलेज भागलपुर, 1971-72 में सहरसा कॉलेज सहरसा और 1978-79 में टीपी कॉलेज मधेपुरा में प्रिंसिपल बनने का ऑफर भी इन्होंने ठुकरा दिया।


श्री चौधरी शिक्षा के अलावा धार्मिक कार्यों और मंदिर के निर्माण के प्रति भी काफी समर्पित रहते आए हैं। 1971-72 में अपने निजी कोष से 268000 खर्च करवा कर इन्होंने सिक्कट में स्थित शिवालय का पुनर्निर्माण करवाया। गौरतलब है कि शिवालय परिसर के दो एकड़ की जमीन भी इनके पूर्वजों द्वारा ही मंदिर को दान में दी गई है। श्री चौधरी ने अपने प्रयास से अपने गांव में एक हनुमान मंदिर का भी निर्माण करवाया है। राजनीति में विशेष रुचि नहीं रखने के बावजूद श्री चौधरी नियमित रूप से समाचार पत्रों एवं पत्रिकाओं का अध्ययन करते रहते हैं। तापमान, इंडिया टुडे, कल्याण, यथावत आदि इनकी पसंदीदा पत्रिकाएं हैं। इनकी धर्मपत्नी श्रीमती वीणा चौधरी एक धार्मिक प्रवृति की दयालु महिला हैं। श्री चौधरी के इकलौते पुत्र केशव कुमार ने भी अर्थशास्त्र से स्नातकोत्तर किया है और अब एक किसान के रूप में अपना जीवन यापन कर रहे हैं। इनकी तीनों पुत्रियां नीलम कुमारी, किरण कुमारी और माला कुमारी ने भी स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त किया है। जीवन के अंतिम बेला में श्री चौधरी आध्यात्मिक किताबों के बीच अपना समय गुजार रहे हैं।

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