29. नरेंद्र कुमार उर्फ मुकेश
कटिहार के मशहूर अधिवक्ता, शिक्षाप्रेमी, समाजसेवी, गरीबों के हमदर्द, स्काटिश आइडियल स्कूल सेमापुर के संस्थापक निदेशक, बरेटा स्टेट झक्सू नारायण चौधरी के पौत्र स्मृति शेष नरेंद्र कुमार उर्फ मुकेश ने समाज के लोगों से जुड़कर आजीवन समाजसेवा के कार्यों में समर्पित रहे। इनका जन्म 15 नवम्बर 1969 को हुआ था। इनकी माता का नाम स्वर्गीय नीलावती देवी और पिता का नाम स्वर्गीय महेंद्र नारायण चौधरी है। एक संपन्न परिवार के मेधावी छात्र होने के कारण इनकी प्रारंभिक शिक्षा अंग्रजी माध्यम के एम्स चिल्ड्रेन और मार्डन इंग्लिश स्कूल हजारीबाग से हुई। इन्होंने 1985 में सेमापुर स्थित उच्च विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण किया। इसके बाद संथाल परगना कॉलेज दुमका से इन्होंने इंटर से स्नातकोत्तर की पढ़ाई पुरा किया। भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा से इन्होंने 1995 में स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त किया। आगे चलकर भूपेंद्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय मधेपुरा से ही इन्होंने एलएलबी की डिग्री भी हासिल किया। 26 अगस्त 1996 से इन्होंने व्यवहार न्यायालय कटिहार में अपना वकालत प्रारंभ किया। दरअसल वकालत का पेशा इनके लिए समाजसेवा और गरीबों को न्याय दिलाने का एक माध्यम मात्र था। सिविल, क्रिमिनल और रेवन्यू मामलों के विशेषज्ञ श्री चौधरी वकालत से होने वाली आमदनी से ज्यादा अपने गरीब मुवकीलों के सहयोग में खर्च कर दिया करते थे। कटिहार जिला के बालक अधिकार संरक्षण अधिनियम 2005 से संबंधित वादों के संचालन हेतु इन्हें विशेष लोक अभियोजक के दायित्वों निभाने का सौभाग्य भी प्राप्त था। शहर के सभी बड़े अधिवक्ताओं शिव सुंदर सिंह, अरविंद सिंह, नितेश जी, अवधेश झा, अमरेंद्र चौधरी, अशोक सिंह, संजय सिंह आदि से इनकी घनिष्ठ मित्रता थी। यह इतने विनम्र और व्यवहारिक व्यक्ति थे कि अपने संपर्क में आने वाले छोटे -बड़े, अमीर -गरीब, अनपढ़ -विद्वान सभी से इनका आत्मीय संबंध बन जाता था।
इतना ही नहीं अस्सी के दशक में अपने ब्रदर इन लॉ द्वारा कटिहार में स्थापित स्कॉटिश पब्लिक स्कूल में भी इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। अपने समाज के लोगों को अंग्रेजी माध्यम का उच्च स्तरीय विद्यालय उपलब्ध कराने के उद्देश्य से इन्होंने 9 फरवरी 2015 को आवासीय स्कॉटिश आइडियल स्कूल के नाम से सेमापुर बाज़ार में एक पूर्व में संचालित प्राइवेट स्कूल का अधिग्रहण किया। यह विद्यालय बहुत कम समय में अपने उच्च स्तरीय शैक्षणिक माहौल के कारण लोकप्रिय हो गया है। शिक्षा के साथ साथ इन्हें खेल से भी काफी लगाव था। 2011 से बॉलीवाल एसोसिएशन कटिहार के आजीवन सदस्य रहे एवं फुटबॉल एसोसिएशन कटिहार का सचिव भी श्री चौधरी रह चुके हैं। दुर्भाग्यवश एक सड़क हादसे में 31 दिसंबर 2016 को इनकी मृत्यु हो गई। वर्तमान में इनकी धर्मपत्नी श्रीमती कल्याणी सिंह अपने पति के द्वारा स्थापित विद्यालय का कुशलता पूर्वक संचालन कर शिक्षा का अलख जगाने के अपने पति के अधूरे अभियान को पूरा करने का बड़ी शिद्दत से ईमानदार प्रयास कर रही हैं। इनका इकलौता पुत्र श्रेयस कुमार पुणे युनिवर्सिटी से ला की पढ़ाई और इकलौती पुत्री प्राची नयन सेंट स्टीफन्स कॉलेज देहली से संस्कृत में ऑनर्स कर रहे हैं।
क्या कहते हैं लोग :-
1. श्री चौधरी की धर्मपत्नी श्रीमती कल्याणी सिंह के अनुसार मैं बहुत खुश नसीब हूं कि मुझे ऐसा जीवनसाथी प्राप्त हुआ। मैंने इन्हें मदद के लिए आने वाले हर जरूरतमंद का भरपुर सहयोग करते देखा और इन्होंने तमाम व्यस्तताओं के बावजूद स्वयं मेरा या परिवार के सदस्यों के जरूरतों का पुरा ख्याल रखा।
2. इनके मार्गदर्शक और सबसे करीबी रहे इनके बड़े भाई समाजसेवी अमरेंद्र नारायण चौधरी के अनुसार हमलोग अपने दादा जी के पदचिन्हों पर चलते हुए समाजसेवा के कार्यों में यथासंभव सहयोग करने का प्रयास करते रहे हैं।मेरे दादाजी राम नारायण चौधरी भी समाज में शिक्षा के विकास के प्रति काफी चिंतित थे। 1958 में सेमापुर बाजार में पूर्व में चल रहे हाई स्कूल के लिए जमीन उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण बच्चों की शिक्षा में काफी परेशानी आ रही थी। ऐसे में दादाजी ने अपने पिता से आग्रह कर पांच एकड़ जमीन विद्यालय को दान में दिलवाया। भूमि दाता होने के कारण दादाजी को विद्यालय प्रबंधन समिति का सचिव बनाया गया लेकिन सारा कामकाज मेरे पिताजी को देखना होता था। इन्हीं के सुझाव पर इस विद्यालय का नाम इनके प्र दादाजी स्वर्गीय झकसु नारायण चौधरी के नाम पर रखा गया। 1958-60 में तिर्थानंद झा और 1960 में राजेंद्र प्रसाद चौधरी को विद्यालय का प्रधानाध्यापक बनाने में मेरे पिताजी महेंद्र नारायण चौधरी की महत्वपूर्ण भूमिका रही। राजेंद्र प्रसाद चौधरी के प्रधानाध्यापक बनने के पश्चात ही इस विद्यालय में नामांकन हेतु प्रवेश परीक्षा का आयोजन होने लगा और यह विद्यालय अपने अनुशासन और पढ़ाई के लिए संपूर्ण बिहार में अपनी विशेष पहचान बनाने में सफल रहा। इन्हीं के प्रयास के पश्चात इस विद्यालय में स्थाई शिक्षकों की नियुक्ति हो पाई और उनके लिए ईपीएफ की सुविधा भी उपलब्ध करवाया जा सका।
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