30. गनौरी मोची
गनौरी मोची दाने दाने को मोहताज बकिया निवासी महादलित मजदूर परिवार का एक ऐसा होनहार छात्र जिसने अपने कठिन परिश्रम और लग्न की बदौलत फर्श से अर्श का सफर तय कर संघर्ष और सफलता का अद्भुत मिसाल प्रस्तुत किया है और यह साबित कर दिखाया कि -
"मेहनत वह सुनहरी चाबी है जो किस्मत के भाग को खोल देती है।"
बिहार पब्लिक सर्विस कमीशन के 42वीं बैच के पदाधिकारी श्री मोची मार्च 2019 में झारखंड के उपनिदेशक सह उप सचिव योजना सह वित्त विभाग रांची से सेवानिवृत्त हुए हैं। इनका जन्म अत्यंत ही गरीब परिवार में 18 मार्च 1959 को बरारी प्रखंड के बकिया पंचायत में हुआ था। इनके पिता का नाम विशु मोची एवं माता का नाम कमला देवी है जो एक भूमिहीन मजदूर थे। इनके पिताजी गांव की संपन्न लोगों का जूता चप्पल मरम्मत किया करते थे जबकि माता गांव में महिलाओं के प्रसव कार्य में दाई का कार्य कर किसी प्रकार अपने बच्चों का भरण पोषण करती थी।गनोरी बचपन से ही एक मेधावी छात्र था। छोटी उम्र से बकरी चराना और अपने पिता के कार्यों में सहयोग करने के साथ-साथ या गांव में स्थित सरकारी विद्यालय में पढ़ने जाया करता था। अपनी पढ़ाई के लिए आवश्यक किताबें खरीदने के लिए इनके पास पैसे नहीं होते थे लेकिन एक मुंह बोली बहन सत्यभामा दीदी के द्वारा प्रतिवर्ष अपनी पुरानी किताब इसे उपहार स्वरूप दे दिए जाने के कारण इन्हें पढ़ने के लिए किताबें मिल जाया करता था। 1976 में जब इन्होंने भवानीपुर स्थित हैहय कलवार जोतराम राय उच्च विद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा दिया तो परीक्षा देने वाले 50 छात्रों में गनौरी मोची सफल होने वाले दो छात्रों में अपने इलाके से इकलौते छात्र थे। गनोरी की सफलता पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गया। गौरतलब है कि मैट्रिक परीक्षा के कुछ ही दिन पहले इनकी एक बहन गंगा में नाव के दुर्घटाग्रस्त होने के कारण डूब गई थी जिसके कारण इनका पूरा परिवार मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गया था। ऐसे में गनोरी मैट्रिक की परीक्षा नहीं देना चाहते थे लेकिन इनके विद्यालय के गणित के शिक्षक बिंदेश्वरी झा एवं हिंदी के शिक्षक शिवनंदन झा ने इन्हें घर से बुलवाकर हर हाल में परीक्षा देने के लिए तैयार किया और अपने पॉकेट से कुछ आर्थिक सहयोग देकर इन्हें एग्जामिनेशन सेंटर कटिहार भेजा। बकिया निवासी एवं मिथिला यूनिवर्सिटी में तत्कालीन एग्जामिनेशन कंट्रोलर मूसा काजमी के कानों में जब गनोरी की सफलता की बात पड़ी तो उन्होंने अपने नौकर से खबर भिजवा कर गनोरी को मिलने के लिए अपने घर बुलाया। मूसा काजमी गनौरी से मिलकर काफी खुश हुए और उन्हें अपने कॉलेज में चपरासी का नौकरी ऑफर किया। चुकिः गनोरी का परिवार उस समय भुखमरी के कगार पर था अतः गनौरी ने सहर्ष यह ऑफर स्वीकार कर लिया लेकिन मूसा काजमी को जब गनोरी के मेधा का ज्ञान हुआ तो उन्होंने उसे आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और एक बड़ा अफसर बनने की संभावनाएं उन्हें गनोरी में दिखने लगी। काफी मान मनोव्वल के बाद जब ग्लोरी आगे पढ़ने के लिए तैयार हुआ तो सबसे बड़ी समस्या कॉलेज की उसके फीस की थी। ऐसे में श्री काजमी ने गांव के लोगों से चंदा इकट्ठा कर गनोरी का नामांकन डीएस कॉलेज कटिहार में करवा दिया।
डी एस कॉलेज में एडमिशन के बाद इन्होंने अपने पास मौजूद कुछ खस्सी बकरी को बेचकर पढ़ाई के लिए कटिहार चले गए और वहां बच्चों को पढ़ा कर अपना पढ़ाई करने लगे। इस दौरान यह गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। ऐसे में डीएस कॉलेज के ही एक आदेशपाल उत्तम यादव की पत्नी ने अपने पति से कह कर इनका इलाज करवाया। 1978 में इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात इन्होंने डी एस कॉलेज में ही अर्थशास्त्र विषय से ऑनर्स की पढ़ाई के लिए एडमिशन ले लिया। इसी बीच यह अपने एक रिश्तेदार के यहां मनिहारी प्रखंड स्थित दोगाछी केवाला गांव गए। इस गांव में उनके समुदाय का ढाई सौ से ज्यादा परिवार कबीरपंथी समुदाय के अनुयायी थे। उन्होंने अपने समुदाय के मैट्रिक पास होनहार छात्र को देखकर उन्हें अपने गांव में स्थित कबीर मठ का गुरु नियुक्त कर दिया और गांव के 300 से ज्यादा बच्चे उनसे शिक्षा ग्रहण करने लगे। यहां इन्होंने लगभग दो वर्ष का समय गुजारा। इसी दौरान यह कटिहार के तत्कालीन सांसद युवराज सिंह के संपर्क में आए। युवराज सिंह ने इन्हें जनता पार्टी का कार्यकर्ता बना दिया। 1980 में जब इन्होंने अपना स्नातक का डिग्री प्राप्त किया तो एक बार फिर से अपने गांव वापस लौट आए। इसी बीच विधानसभा चुनाव में इन्हें कोढा विधानसभा से जनता पार्टी का उम्मीदवार बनाए जाने की चर्चा भी जोरों पर थी। 1981-83 में इन्होंने भागलपुर विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र से स्नातकोत्तर की डिग्री प्राप्त किया। इस बीच मूसा काजमी लगातार इन्हें प्रशासनिक सेवा की तैयारी के लिए प्रेरित करते रहते थे और उनकी प्रेरणा से इन्होंने बीपीएससी की तैयारी भी प्रारंभ कर दिया। संसाधनों के घनघोर अभाव के कारण इन्हें अपने शुरुआती दो प्रयासों में सफलता प्राप्त नहीं हुई। 1986-88 में अपने परिवार और घर की आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए इन्होंने राम लखन सिंह कॉलेज अनिशाबाद पटना में लेक्चरर की नौकरी कर ली। 1988 में बीपीएससी द्वारा आयोजित 42 वीं बैच की परीक्षा में अंतिम रूप से सफल होकर इन्होंने 7 सितंबर 1990 को सहायक जिला योजना पदाधिकारी के रूप में सहरसा जिला में योगदान किया। अतिरिक्त प्रभार के रूप में इन्हें जिला समाज कल्याण पदाधिकारी, जिला कल्याण पदाधिकारी और अनुसूचित जाति जनजातिव सहकारिता विकास निगम पदाधिकारी (कार्यपालक पदाधिकारी) के दायित्वों का भी निर्वहन करना पड़ता था। यहां उन्होंने लगभग 6 वर्षों तक अपनी सेवा दिया। इसके बाद 22 फरवरी 1997 को इनका स्थानांतरण कल्याण विभाग में दुमका जिला में विशिष्ट पदाधिकारी पहाड़ियां कल्याण पदाधिकारी के रूप में हो गया। यहां अतिरिक्त प्रभार के रूप में कार्यपालक पदाधिकारी नगर पंचायत दुमका, अनुमंडल कल्याण पदाधिकारी दुमका, अनुसूचित जाति जनजाति पदाधिकारी दुमका, सहकारिता विकास निगम पदाधिकारी दुमका के दायित्वों का निर्वहन इनके द्वारा किया जाता था। जून 2000 में गढ़वा में जिला कल्याण पदाधिकारी के रूप में इनका स्थानांतरण हो गया। यहां भी इन्हें समाज कल्याण पदाधिकारी, जिला आपूर्ति पदाधिकारी, डिप्टी कमिश्नर के गोपनीय प्रभारी आदि का दायित्व जिलाधिकारी द्वारा सौंपा गया था। गढ़वा के नगर परिषद कार्यपालक पदाधिकारी के रूप में इनके कार्यों की काफी सराहना हुई थी। 5 वर्षों के पश्चात 2005 में जामताड़ा जिला में उनका जिला कल्याण पदाधिकारी एवं जिला संपर्क पदाधिकारी के रूप में स्थानांतरण हो गया। यहां इन्हें अतिरिक्त प्रभार के रूप में जिला आपूर्ति पदाधिकारी, जिला जन संपर्क पदाधिकारी एवं डीआरडीए के डायरेक्टर और समाज कल्याण पदाधिकारी के दायित्वों का भी निर्वहन करना पड़ा।
बिहार के बंटवारे के पश्चात प्रशासनिक पदाधिकारियों के कैडर बंटवारे में इनका ट्रांसफर बिहार झारखंड कैडर से भागलपुर में हो गया जहां इन्हें जिला योजना पदाधिकारी एवं जिला सांख्यिकी पदाधिकारी के रूप में एक वर्षों तक अपनी सेवा देनी पड़ी। एक वर्ष पश्चात इन्हें पुनः झारखंड कैडर में जिला योजना पदाधिकारी के रूप में पाकुड़ भेज दिया गया। यहां इन्हें जिला सांख्यिकी पदाधिकारी, जिला समाज कल्याण पदाधिकारी, जिला जनसंपर्क पदाधिकारी एवं बाल श्रमिक विभाग में निदेशक, जिला विकास पदाधिकारी के गोपनीय प्रभारी एवं पाकुड़ जेल के जेल सुपरीटेंडेंट के दायित्वों का निर्वहन भी करना पड़ा।
2013 में इनका स्थानांतरण उड़ीसा छत्तीसगढ़ के बॉर्डर पर झारखंड के सिमडेगा जिला में जिला योजना पदाधिकारी के रूप में कर दिया गया। यहां अतिरिक्त प्रभार के रूप में जिला विकास पदाधिकारी, सामान्य शाखा के प्रभारी, नगर परिषद के कार्यपालक पदाधिकारी एवं जिला कल्याण पदाधिकारी की जिम्मेदारियों का निर्वहन इनके द्वारा किया गया। मार्च 2019 में श्री मोची सेवानिवृत्त हो चुके हैं लेकिन अपने 30 वर्षों के प्रशासनिक पदाधिकारी के रूप में कार्यकाल के दौरान इन्होंने गरीबों पिछड़ों और लाचार लोगों की समस्या के समाधान हेतु दिन-रात कठिन परिश्रम किया है।श्री मोची के परिवार में इनकी धर्मपत्नी श्रीमती शर्मिला देवी एवं छः पुत्रियां रूप श्री प्रसाद, रुचि श्री प्रसाद, डॉक्टर जूही श्री प्रसाद, वर्षा श्री प्रसाद, प्रेरणा श्री प्रसाद और लवली श्री प्रसाद हैं।
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