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1958 में सेमापुर बाजार में पूर्व में चल रहे हाई स्कूल के लिए जमीन उपलब्ध नहीं हो पाने के कारण बच्चों की शिक्षा में काफी परेशानी आ रही थी। ऐसे में श्री चौधरी ने अपने पिता से आग्रह कर पांच एकड़ जमीन विद्यालय को दान में दिलवाया। भूमि दाता होने के कारण श्री चौधरी के पिताजी को विद्यालय प्रबंधन समिति का सचिव बनाया गया लेकिन सारा कामकाज इन्हें ही देखना होता था। इन्हीं के सुझाव पर इस विद्यालय का नाम इनके दादाजी  स्वर्गीय झकसु नारायण चौधरी के नाम पर रखा गया। 1958-60 में तिर्थानंद झा और 1960 में राजेंद्र प्रसाद चौधरी को विद्यालय का प्रधानाध्यापक बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। राजेंद्र प्रसाद चौधरी के प्रधानाध्यापक बनने के पश्चात ही इस विद्यालय में नामांकन हेतु प्रवेश परीक्षा का आयोजन होने लगा और यह विद्यालय अपने अनुशासन और पढ़ाई के लिए संपूर्ण बिहार में अपनी विशेष पहचान बनाने में सफल रहा। श्री चौधरी के प्रयास के पश्चात इस विद्यालय में स्थाई शिक्षकों की नियुक्ति हो पाई और उनके लिए ईपीएफ की सुविधा भी उपलब्ध करवाया जा सका।

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