42. परशुराम सिंह
बिशनपुर पंचायत के वर्तमान मुखिया परशुराम सिंह ने अखिल भारतीय डाक कर्मचारी संघ का सचिव रहते हुए पूर्व केंद्रीय मंत्री तारिक अनवर एवं निखिल चौधरी के सहयोग से कटिहार में डाक अधीक्षक कार्यालय का सृजन कर संपूर्ण जिला वासियों को एक अद्भुत तोहफा प्रदान किया है। इनका जन्म 25 मार्च 1954 को धेनुआ गांव में हुआ था, जो 1964 में गंगा कोसी के कटाव के कारण वर्तमान में अस्तित्व में नहीं है। इनकी माता का नाम स्वर्गीय झालो देवी एवं पिता का नाम स्वर्गीय खंतर प्रसाद सिंह है। इनके पिताजी एक साधारण किसान थे। अपने चार भाई-बहनों में तीसरे नंबर पर आने वाले परशुराम सिंह को घर के लोग प्यार से पारस के नाम से पुकारते थे। इनकी प्रारंभिक शिक्षा दीक्षा मध्य विद्यालय बकिया में हुई लेकिन आर्थिक स्थिति बहुत खराब होने के कारण इन्हें आगे की पढ़ाई के लिए अपनी फुफू (बुआ) जागो देवी के यहां मनिहारी में चार वर्षों तक गुजारा करना पड़ा। 1971 में इन्होंने हेमचंद्र उच्च विद्यालय हेमकुंज, मनिहारी से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण किया। इस दौरान इन्हें अपने हाई स्कूल के प्रधानाध्यापक प्रभाकर प्रसाद सिंह एवं भौतिकी शास्त्र के शिक्षक दिनेश प्रसाद सिंह का विशेष स्नेह और मार्गदर्शन प्राप्त होता रहता था। श्री सिंह को पढ़ाई के दौरान अपने परिवार की गरीबी के साथ साथ काल कर्म में गंगा कोसी के कटाव के कोप का भी खूब शिकार होना पड़ता था। 1964 में कटाव के कारण इनके परिवार को अपना जन्म स्थान धेनुअा को छोड़कर चमड़दना बहियार में आकर बसना पड़ा। 1971 में एक बार फिर कटाव के कारण इनके परिवार को अपना आश्रय बदल कर डीह में शरण लेना पड़ा। इन तमाम कठिनाइयों के बावजूद 1971-73 के बीच इन्होंने मूसापुर स्थित शिक्षण प्रशिक्षण महाविद्यालय से बीटी की ट्रेनिंग भी प्राप्त किया। अपने छात्र जीवन के दौरान कैलाश चौधरी (सेवानिवृत्त शिक्षक) एवं सुरेश मोहन गोस्वामी (सेवानिवृत्त डाकघर कर्मी) इनके दो करीबी मित्र हुआ करते थे। 1974 में एक बार फिर इनका डीह स्थित आश्रय भी कटाव की भेंट चढ़ गया और इनका परिवार बिशनपुर स्थित वर्तमान आवास पर आकर बसने को मजबूर हुए। ऐसी विषम परिस्थिति में इनकी पढ़ाई तो छूट गई लेकिन इन्हें भारतीय डाक विभाग में डाक सहायक की नौकरी मिल गई और तीन अक्टूबर 1974 को इन्होंने पोस्टल डिवीजन सहरसा के अन्तर्गत आने वाले निर्मली अनुमंडल में अपना पहला योगदान दिया। उस समय इन्हें तीन सौ चौबीस रुपया पचास पैसा वेतन प्राप्त होता था, जिससे किसी प्रकार यह अपना और अपने परिवार का गुज़ारा कर लेते थे। 1976 में इन्हें अखिल भारतीय डाक कर्मचारी संघ कटिहार का निर्विरोध सचिव बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ और डाक कर्मचारियों के हित में इनके बेहतर कार्य को देखते हुए ***** में इन्हें पुनः निर्विरोध सचिव बनने में सफलता प्राप्त हुई। इसके बाद आगे भी डाक कर्मचारियों के हित के लिए श्री सिंह आजीवन संघर्ष करते रहे। जुलाई 1977 में इनका विवाह श्रीमती सरस्वती देवी से हो गया। श्री सिंह विवाह के पश्चात भी बेहतर सेवा में जाने को लालायित थे और उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते थे। इसी उद्देश्य से इन्होंने कटिहार के प्रतिष्ठित दर्शन साह महाविद्यालय से एक प्राइवेट छात्र के रूप में आर्ट्स विषय से इंटर की परीक्षा उत्तीर्ण किया लेकिन कार्यालय के कार्यों की व्यस्तता और पारिवारिक दायित्वों के कारण आगे पढ़ाई करने में असफल रहे। 1988-89 के बीच श्री सिंह प्रोन्नति प्राप्त कर उप डाकपाल बनने में सफल रहे। **** में एक बार फिर श्री सिंह प्रोन्नति प्राप्त करने में सफल रहे और इस बार डिप्टी पोस्ट मास्टर के रूप में इन्होंने कटिहार स्थित डाकघर में योगदान किया। उस समय कटिहार स्थित डाकघर डाक अधीक्षक कार्यालय पूर्णिया का हिस्सा हुआ करता था। इन्होंने अपने प्रयास से एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री निखिल चौधरी और तारिक अनवर के सहयोग से कटिहार में नए डाक अधीक्षक कार्यालय को सृजित कर निर्माण करवाने में सफल रहे। ***** में श्री सिंह एक बार पुनः प्रोन्नति प्राप्त कर मुख्य डाकघर कटिहार के पोस्टमास्टर बनने में सफल रहे।
श्री सिंह स्वयं के सरकारी सेवा में व्यस्त रहने के बावजूद अपने गांव समाज के लोगों की समस्याओं के समाधान हेतु लगातार चिंतित और प्रयत्नशील रहते थे। यही कारण है कि ग्रामीणों के आग्रह पर इन्हें अपनी धर्मपत्नी को 2006 में त्रिस्तरीय पंचायती चुनाव के दौरान पंचायत शिक्षिका का ज्वाइनिंग छोड़कर मुखिया पद के लिए चुनाव लड़वाना पड़ा। इस चुनाव में श्रीमती सरस्वती देवी का चुनाव चिन्ह मोमबत्ती छाप था। दुर्भाग्यवश श्रीमती सरस्वती देवी यह चुनाव 400 मतों से पराजित हो गई लेकिन हार के बावजूद इनका और इनकी धर्मपत्नी का समाज सेवा संबंधी गतिविधियों में कोई विशेष फर्क नहीं पड़ा। यही कारण है कि 2011 के त्रिस्तरीय पंचायती चुनाव में इनकी धर्मपत्नी सरस्वती देवी बैगन छाप चुनाव चिन्ह से लगभग 346 वोटों से चुनाव जीतने में सफल रही। मुखिया बनने के बाद इन्होंने अपने पंचायत के सभी अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति परिवार के साढे छह सौ से ज्यादा परिवारों का प्राथमिकता के आधार पर इंदिरा आवास निर्माण करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वहन किया। अपने गांव में बच्चों के प्राथमिक शिक्षा हेतु इनकी धर्मपत्नी ने 21 डिसमिल जमीन दान देकर प्राथमिक विद्यालय चंदन नगर का निर्माण करवाया। तत्कालीन विधायक विभाष चंद्र चौधरी के सहयोग से डहरा में एक करोड़ सैंतिंस लाख के फंड से पुल का निर्माण भी इनके द्वारा करवाया गया। इसके अलावा ग्रामीण विकास विभाग एवं अन्य पंचायती योजनाओं को अपने पंचायत में बेहतर तरीके से लागू करवाने के कारण प्रखंड विकास पदाधिकारी के द्वारा भी इनकी काफी सराहना की जाती रही है। 31 मार्च 2014 को मुख्य डाकघर कटिहार के पोस्टमास्टर पद से सेवानिवृत होकर श्री सिंह तन मन धन से समाज सेवा के कार्य में समर्पित हो गए। सेवानिवृत्ति के पश्चात 2016 के पंचायती चुनाव में इन्होंने स्वयं मुखिया का चुनाव लड़ा और बैगन छाप चुनाव चिन्ह से तीन सौ इक्यावन वोटों से चुनाव जीतने में भी सफल रहे। अपने पंचायत का मुखिया रहते हुए इन्होंने सात निश्चय योजना, 14वें वित्त और पंचम वित्त से पंचायत के सभी सड़कों का (लगभग पंद्रह किलोमीटर) पक्कीकरण करवाया। अपने गांव के सभी घरों में बिजली पहुंचाने के लिए उन्होंने लगातार विद्युत कार्यपालक अभियंता कटिहार से पत्राचार किया एवं कटिहार के विधान पार्षद अशोक अग्रवाल के सहयोग से पंचायत के सभी गांवों में विद्युतीकरण करवाने में इन्हें सफलता प्राप्त हुई। सितंबर 2019 में इन्होंने लालू यादव की विचारधारा से प्रभावित होकर राजद की प्राथमिक सदस्यता ग्रहण कर लिया है। अपने सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन में इन्हें वर्तमान विधायक, नीरज कुमार विधान पार्षद अशोक अग्रवाल एवं पूर्व केंद्रीय मंत्री तारिक अनवर का भरपूर सहयोग और मार्गदर्शन प्राप्त होता रहा है। श्री सिंह के दो बच्चे हैं - बड़ी लड़की डॉक्टर प्रियंवदा पटना एम्स में डॉक्टर हैं और इकलौता पुत्र सजल सिंह कटिहार में सीनियर सेक्शन इंजीनियर के पद पर कार्यरत हैं।
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